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गिले–शिकवे

apnisoch

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कब तक यह सब ऐसे ही चलेगा ? सुमित यह सब सोच-सोचकर परेशान था. कभी बलदेव चाचा के घर के लोग उसके परिवार को, पशुओं को, और फसलों को नुकसान पहुँचाते तो कभी उसके परिवार के लोग ठीक इसी प्रकार की प्रतिक्रिया करते. पिछले दिनों तो हद ही हो गई जब उसके चचेरे भाई संजय ने सबकी नजर बचाकर उसकी भैस को कोई जहरीला पदार्थ खिला दिया. वह तो समय रहते इलाज हो जाने के कारण उसकी जान बच गई बरना अनर्थ हो जाता. बहुत गुस्सा आया था सुमित को उस दिन, भला उस बेजुवान जानवर ने किसी का क्या बिगाड़ा था ? इसी प्रकार की छोटी मोटी घटनाएं होना, दोनों परिवारों के लिए आम बात थी. दोनों परिवार के लोगों को एक दूसरे को नुकसान पहुंचाकर क्या आनंद मिलता था, वह समझ नहीं पाता था. इस गिले–शिकवे का कोई कारण भी उसकी समझ मे नहीं आता था.

सुबह का समय था, यही सब सोचता हुआ वह गाँव की चकरोड पकड़कर अपने खेतों की ओर जा रहा था. उसके और उसके चाचा के खेत अगल-बगल ही थे. तभी विपरीत दिशा से ट्रैक्टर लेकर उसका चचेरा भाई संजय कब उसके पास पहुँच गया उसे पता ही नहीं चला . जब गंदे पानी के छींटे उसके ऊपर पड़े तब उसका ध्यान भंग हुआ. अपने ध्यान मे डूबे सुमित कुछ समझे,  उसके संभलने के पहले ही संजय अपनी करामात दिखाकर आगे जा चुका था. हुआ यह था कि चकरोड पर लगे कीचड़युक्त पानी मे संजय ने जान -बूझकर ट्रैक्टर कूदा दिया था ,जिससे गंदे पानी के छींटों से सुमित के कपड़े और  उसका शरीर भींग गया था. वह गुस्से से पलटा, परंतु तब–तक संजय हँसते हुए ट्रैक्टर लेकर निकाल चुका था. वह सोचने लगा कि यह सब कर के संजय को क्या मजा मिला होगा ?

उसने खेत पर जाने का विचार त्याग दिया और घर वापस लौट आया, लेकिन यहाँ पहुंचकर उसका सामना एक नए बखेड़े से हो गया. किसी ने पिछली रात बलदेव चाचा के हैन्ड पम्प का हैंडल निकाल लिया था. चाचा के परिवार वालों को लग रहा था, की ये काम सुमित के घरवालों ने किया है . फिर क्या था दोनों परिवारों के बीच का वाकयुद्ध अपने चरम पर था. उसने जब संजय से रास्ते मे उसके द्वारा की गई हरकत का कारण जानना चाहा, तो वह व्यंग्यात्मक लहजे मे बोला , “देखकर तो खुद चलते नहीं और दोष दूसरों का देते हो”.

सुमित का मन किया कि एक थप्पड़ जमाए लेकिन जानता था कि बोलने का कोई फायदा नहीं. उसने जान बूझकर सुबह वाली घटना को घर के लोगों को और विशेषकर अपने छोटे भाई अमित को नहीं बताई, क्योंकि वह जानता था कि बात का बतंगड बनते देर नहीं लगेगी. लेकिन उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था. उसके मन मे सिर्फ एक ही बात चल रही थी कि यह सब जो भी चल रहा था वह सब कहीं से भी ठीक नहीं था. यह सब तुरंत बंद होना चाहिए ,क्योंकि इससे दोनों परिवारों कि प्रतिष्ठा और सम्मान मिट्टी मे मिल रहा था. जब भी दोनों परिवारों मे कुछ भी होता आस –पास के लोग इकट्ठा होकर उनके झगड़े का आनंद लेते और जब तक विवाद ज्यादा नहीं बढ़ता तब तक कोई बीच बचाव भी नहीं करता. इस बात को दोनों परिवार समझकर भी अनदेखा कर रहे थे, जबकि दोनों परिवारों को कोई कमी नहीं थी. अच्छा घर-मकान, जमीन-जायदाद, खेती–बारी, छोटा परिवार सब कुछ था दोनों के पास. कोई किसी बात मे किसी से कम नहीं था.

गिले–शिकवे की कोई कोई खास वजह भी समझ मे नहीं आती थी. अभी दो साल पहले तक सब  कुछ ठीक-ठाक था. साथ-साथ आना –जाना, उठना-बैठना, खाना–पीना, तीज त्योहार मनाना, सब कुछ तो था दोनों परिवारों मे. वे आपस मे न सिर्फ खुशियां बांटते थे, अपितु एक दूसरे के दुख-दर्द मे भी शामिल होते थे. फिर ऐसा क्या हुआ, और कहाँ हुआ कि ऐसी बैमनश्यता उत्पन्न हो गई दोनों परिवारों के बीच?

वह और संजय दोनों हमउम्र थे, दोनों लगभग साथ-साथ पले, बढ़े, प्राइमरी से लेकर कालेज स्नातक तक दोनों साथ ही पढे. वह पढ़ाई के प्रति थोड़ा गंभीर था और शुरू से ही उसके अच्छे अंक आते थे ,जबकि संजय स्वभाव से चंचल था और पढ़ाई मे उसका मन  कुछ कम ही लगता था. एकाएक जैसे उसे कुछ याद सा हो आया. बारहवीं की बोर्ड की परीक्षा मे उसके अच्छे अंक आए थे ,जबकि संजय सामान्य अंकों के साथ उत्तीर्ण हुआ था. दोनों परिवारों मे उसी मौके पर मिठाइयों के आदान–प्रदान के दौरान उसके परिवार के किसी सदस्य के द्वारा की गई टिप्पणी पर बलदेव चाचा के परिवार ने बुरा मान लिया था. डिग्री कालेज मे एडमिशन तो दानों ने साथ–साथ लिया था, परंतु कटुता के बीज तभी उग आए थे, जो अब विराट पेड़ का रूप धारण कर लिया था और आज जैसी विषम स्थिति उत्पन्न हो गई.

भारी मन से तैयार होकर वह पुन: घर से खेत पर जाने  के लिए निकल पड़ा. कुछ दिनों के लिए कालेज की छुट्टी थी. कुछ देर मे वह खेत पर पहुँचा, तो देखा कि कुछ नील गायें उसके और चाचा के खेतों मे फसल चर रही हैं. उसने तुरंत डंडा उठाया और नील गायों को न सिर्फ अपने खेतों से बल्कि चाचा के खेतों से भी दूर भगा दिया. उसी समय संजय भी अपने खेतों पर आ पहुँचा, उसने दूर से ही सुमित को नील गायों को भगाते हुए देख लिया था. कभी–कभी छोटी–छोटी बातें भी मनुष्य के मन को छू जाती हैं और इनका प्रभाव इतना गहरा होता है, कि मनुष्य उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता.

कुछ देर मे ही दोनों के खेतों पर मजदूर आकार काम पर लग गए. धीरे–धीरे दोपहर हो गई थी और संजय का छोटा भाई अजय उसका खाना  लेकर आ गया. अभी तक सुमित के घर से खाना नहीं आया था. संजय ने अजय को सुमित को बुलाने के लिए कहा. अजय ने थोड़े आश्चर्य से अपने भाई को देखा लेकिन बड़े भाई की बात मानकर वह सुमित को बुला लाया. सुमित थोड़ा अचरज मे था लेकिन वह आ गया, उसी वक्त सुमित का भाई अमित भी उसका खाना लेकर आ पहुँचा. प्राय; उनका खाना घर से नौकर ही लाया करते थे, परंतु स्कूल बंद होने के कारण दोनों के ही छोटे भाई आए थे. अमित को आया देख संजय ने अमित को भी आवाज देकर बुला लिया. आश्चर्यचकित सा वह भी वहीं आ गया. सभी चुपचाप खड़े होकर एक दूसरे का मुह ताक रहे थे,कि संजय बोला “आओ आज हमलोग मिलकर खाना खाते हैं” .

सुमित मुस्कराकर बैठ गया और सभी ने एकसाथ बैठकर खाना खाया. खाना खाने के बाद अजय और अमित आश्चर्य मिश्रित खुशी के साथ घर जाने के लिए तैयार हुए,जैसे उन्हे घर पहुँचने की और यह समाचार घरवालों को देने की जल्दी हो, तभी सुमित ने पीछे से आवाज दी “अमित अम्मा से बोल देना कि रात का खाना हम सभी के लिए बनायेंगी, आज चाचा–चाची एवं हम सभी साथ-साथ खाना खाएंगे. “ उसको लग रहा था कि वर्षों के “गिले –शिकवे” आज एक मन्द  हवा के झोंके के साथ दूर कहीं बहुत दूर उड़ गए थे और इस हवा के झोंके से उसका मन मयूर नाच उठा ,

 

प्रार्थी

रामाश्रय प्रसाद वर्णवाल

वरिष्ठ प्रबंधक

इंडियन बैंक

नई दिल्ली 110001

मो – 7042409880

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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