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सबसे बड़ी खुशी

apnisoch

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रुचिका, वर्तिका के व्यवहार के विषय मे जितना सोचती उसकी उलझने उतनी ही बढ़ती जाती. रुचिका उम्र मे वर्तिका से चार वर्ष छोटी थी. वर्तिका उम्र मे बड़ी होने के साथ-साथ रिश्ते में भी उसकी जेठानी थी. वर्तिका बात-बात मे उसे अहसास दिलाती की वह न सिर्फ उम्र मे बल्कि हर तरह से बड़ी और समझदार है. रुचिका अपनी ओर से पूरा प्रयास करती और वर्तिका को पूरा सम्मान देती. उसका हर संभव प्रयास होता कि उससे कोई भूल न हो, फिर भी उससे थोड़ी भी गलती होती नहीं की रुचिका को ऐसा लगता कि वर्तिका घर सिर पर उठा लेती हो. रुचिका तो कभी-कभी इतना खिन्न हो जाती कि उसका मन करता कि वह घर छोड़कर कहीं चली जाय. कई बार उसने अपने पति रवि से इस बारे मे बात करना चाहा, परंतु वह भी हँसकर टाल देता था.

समय बीतने के साथ रुचिका का मन लगातार खराब होता गया, उसकी घुटन और कुंठा घटने की बजाय बढ़ती जा रही थी. उस दिन रात से ही उसका सिर दर्द कर रहा था, उसके ससुर की सुबह उठने की आदत थी. वह सुबह उठते और चाय पीते, फिर टहलने जाते थे. रुचिका और वर्तिका बारी-बारी से यह काम करतीं थी. उस दिन रुचिका की बारी थी, परंतु सिर दर्द के कारण वह उठ नहीं पाई. ससुर ने उसे आवाज दी, परंतु वह उठी नहीं क्योंकि उसको रात मे नीद पूरी न होने के कारण सुबह-सुबह नीद लग गई थी. ससुर की आवाज सुनकर वर्तिका उठी ओर उसने चाय बनाकर ससुरजी को दिया.

जब सुबह सभी उठे तो वर्तिका सबके सामने रुचिका की नींद का मजाक बनाने लगी, सुनकर रुचिका को बहुत बुरा लगा ओर वह सबके सामने ही वर्तिका से लड़ पड़ी. उसे रवि से उम्मीद थी कि वह तो उसका साथ देगा ही, परंतु वह तो उलटे कहने लगा था कि, “उसे भाभी से माफी मांगनी चाहिए, भाभी बड़ी हैं ओर कुछ कह भी दिया तो लड़ने की जरूरत क्या थी?” रुचिका को बहुत बुरा लगा. उसने मन ही मन सोचा ओर इस निर्णय पर पहुंची कि अब तक उसने बहुत बर्दास्त किया, अब और नहीं. वह उठी और बिना किसी को बताए अपना कुछ सामान लिया और अपने मायके चली आई.

मायके में किसी बात की कोई कमी नहीं थी, और रुचिका यही सोचकर मायके आई थी कि वह वापस नहीं जाएगी, जब तक की रवि उसे लेने नहीं आता. रवि का फोन भी आया, लेकिन उसने उठाया नहीं, बस एक मेसेज डाल दिया कि वह मां के यहां आई है, और वापस तभी आएगी जब तक की वर्तिका भाभी उससे माफी नहीं मांगेगी और रवि उसे लेने नहीं आएगा. वह यह सोचकर मायके आई थी कि मम्मी, पापा, भैया, भाभी सभी उसे हाथों-हाथ लेंगे. परंतु जब लोगों को ज्ञात हुआ कि वह ससुराल वालों को बिना बताए वहां आई है, तो सभी ने उलटे उसे ही समझाना शुरू कर दिया.

उसकी मम्मी ने समझाते हुए कहा, ‘बेटी तुरंत रवि को फोन लगाओ।“ पहले तो वह तैयार नहीं थी, परंतु बहुत जोर देने के बाद रवि को फोन लगाया और बोली, “मैं मायके आ गई हूं और वापस तभी आऊंगी जब तुम अपने व्यवहार के लिए मुझसे माफी मांगोगे और घर के लोग वर्तिका की नहीं मेरी बात मानेगे।“ कहकर बिना जबाब का इंतजार किए उसने फोन भी काट दिया. रवि को रुचिका से ऐसी उम्मीद नहीं थी। उसने फिर फोन लगाया, दो-तीन बार फोन लगाने पर भी रुचिका फोन नहीं उठा रही थी, तो उसकी मम्मी ने उसे डांटा, तब वह फोन उठाकर बोली ,”क्यों बार-बार डिस्टर्ब कर रहे हो?”

“अच्छा बताओ तुम इतना गुस्सा क्यों कर रही हो? घर मे तो छोटी-मोटी बातें होती रहती हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि तुम घर पर किसी को बिना बताए चलीं गई, घर वाले कितना परेशान हैं?” “तुम्हारे लिए छोटी बात होगी, मेरे लिए नहीं, अब तो मैं वापस तभी लौटूँगी जब तुम सब अपने व्यवहार के लिए माफी माँगोगे और मुझे लेने आओगे।“ रुचिका अभी भी गुस्से मे थी. “किस बात की माफी, तुम्हारे साथ ऐसा क्या हो गया कि तुमने इतना बडा कदम उठा लिया और वर्तिका भाभी ने ऐसा क्या कह दिया?” देखो वर्तिका भाभी जो भी कहती या करती हैं, वह घर के भले के लिए”. रवि का जबाब बिल्कुल साफ था.“हाँ, तुम्हे तो उनमे सिर्फ अच्छाई ही दिखाई पड़ेगी, तो रहो उन्ही के साथ.” कहकर रुचिका ने फोन काट दिया।

समय किसी का इंतजार नहीं करता और वह निर्बाध गति से चलता रहता है. समय बीतने के साथ ही रुचिका का मन और परेशान हो उठा. उसकी परेशानी की वजह कुछ और ही थी. धीरे-धीरे उसे लगने लगा था कि उसके मम्मी-पापा के साथ-साथ घर के सभी लोगों का व्यवहार भी अब पहले जैसा नहीं रह गया था. कहां शादी के पहले सभी उसे हाथों-हाथ लिए रहते थे, परंतु जब से वह ससुराल से आई थी, सभी उससे खिचे-खिंचे से रहने लगे थे. उसके पापा ने उसे कई बार समझाने की कोशिश की, कि परिवार चलाने क लिए इतना गुस्सा ठीक नहीं होता, बल्कि उन्होंने रवि से बात भी की, लेकिन उसने विनम्रता से जबाब दिया कि “पापा,रुचिका अपनी मर्जी से गई है उसे किसी ने कुछ कहा नहीं तो वह खुद वापस आए”

रुचिका को अब घर के लोगों के व्यवहार भी खटकने लगा था. समय काटने के लिए उसने एक प्राइवेट स्कूल मे नौकरी कर ली. परंतु कभी-कभी उसका मन उदास हो जाता, सोचने लगती कि कहीं उससे तो कोई गलती नहीं हो रही है,क्योंकि समय बीतने के साथ उसे इस बात का अहशास होने लगा था कि मायके मे पूरा जीवन बिताना संभव नहीं था. आखिर वह क्या करे? रवि का पहले फ़ोन आया करता था, परंतु उसने कभी उससे सीधे मुह बात नहीं की तो उसने भी फ़ोन करना बंद कर दिया, आखिर रवि भी क्या करता, और उसका दोष ही क्या था? अच्छी-खासी नौकरी थी, और उसका पूरा ध्यान भी रखता था.

रुचिका जब गंभीरता से सोचती तो उसे ऐसा लगता कि उसकी खुद की गलती ज्यादा थी. रुचिका की समझ मे नहीं आ रहा था कि वह करे क्या? इसी बीच करवा चौथ का त्यौहार आ गया. उसने देखा कि उसकी भाभी अगल-बगल की महिलाओं के साथ करवा चौथ की तैयारियों मे लग गई थी. उसका मन बिल्कुल ही नही लग रहा था. उसे भली- भांति याद था कि पिछले वर्ष की उत्साह से उसने करवा चौथ मनाया था. उसे वर्तिका की याद भी खूब आ रही थी कि किस प्रकार उसने करवा चौथ का आयोजन किया था और सभी मोहल्ले की औरतें वर्तिका की तारीफ कर रही थी, तो उसने अपनी तारीफ सुनकर कहा था कि अगर रुचिका नहीं होती तो यह सारी तैयारी करना संभव नहीं हो पाता. परंतु उस समय भी उसे वर्तिका की यह बात नागवार लगी थी.

वह सोचने लगी कि उसने नाहक ही इतना बडा कदम उठा लिया था. मनुष्य जब नकारात्मक विचार मन मे रखता है तो उसे अपने अतिरिक्त दूसरे सब मे कमी दिखाई पड़ती है। वह इसी उधेड़बुन मे थी कि अब वह क्या करे? कैसे करवा चौथ मनाए? भला इतनी शिकायत के बाद वह उसी रवि के लिए करवा चौथ का व्रत कैसे रखे? उससे अब रहा नहीं जा रहा था, वह रवि को फोन लगाकर बात करना चाहती थी, लेकिन किस मुह से बात करे? बहुत सोच-विचारकर उसने रवि को फोन लगाया, परंतु उसने फोन नहीं उठाया. वह सोचने लगी भला क्यों फोन उठाए, कितनी बार फोन किया होगा उसने, और मैंने एक बार भी ठीक से बात नहीं की होगी.

अब कह क्या करे? तभी उसे उसकी भाभी ने आवाज दी कि, वह करवा चौथ के लिए तैयार हो जाए. वह अनमने भाव से उठी, उसने मन ही मन कुछ निर्णय लिया, और एक बैग मे जल्दी-जल्दी अपने कुछ कपड़े भरे. वह अपने पापा से बोलनेवाली थी कि वह उसे, उसकी ससुराल छोड़ दें. तभी उसने देखा कि एक बड़ी सी गाड़ी आकर घर के बाहर रुकी. अभी वह सोच ही रही थी कि आखिर कौन आज घर आ सकता है? अब जो उसने देखा, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था. उसकी जेठानी वर्तिका उस गाड़ी की पिछली सीट से उतर रही थी. अभी वह अचंभित खड़ी थी, कि उसका आश्चर्य दुगुना बढ़ाते हुए ड्राइविंग सीट से रवि और अगले गेट से उसके ससुर और पिछली सीट से उसकी सास उतरकर घर की ओर बढ़ने लगीं थी. वह लगभग भागते हुए गई और वर्तिका के गले लगकर फूट-फूटकर रोने लगी। वर्तिका ने उसे बाहों मे भर लिया था, वह बस रोते हुए इतना ही कह पाई , “मुझे माफकर दीजिए दीदी।“

वर्तिका ने हौले से उसका सिर थपथपा दिया. उससे अलग होकर रुचिका ने सबके पाँव छुए और बोली “मैं आप सब की गुनहगार हूँ, हो सके तो माफ कर दीजिए.“ उसकी सास बोली, “बेटा माफी किस बात की,घर मे तो छोटी-मोटी बातें होती रहतीं हैं, हम लोग तो पहले ही आ रहे थे लेकिन रवि ने कल ही नई गाड़ी निकाली थी, तो वर्तिका ने कहा कि सबसे पहले हमलोग रुचिका के यहाँ चलेंगे और उसे सरप्राइस देकर साथ ले आएंगे.“ रवि बोला ”तुम्हारा फोन भी मैंने इसलिए नहीं उठाया था, कैसा लगा हमारा सरप्राइस.”

तब तक रुचिका का पूरा परिवार घर से बाहर आ चुका था। इसके बाद सभी खुशी-खुशी घर लौटे और करवा चौथ का त्यौहार सभी ने मिलकर बहुत उत्साह से मनाया. परंतु ना जाने वर्तिका को ऐसा क्यों लग रहा था कि रुचिका घर तो आ गई थी लेकिन वह अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं है . उसने यह बात अपनी सास से बताई, “माँजी पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि रुचिका अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है, और यह बात परिवार के लिए और उन दोनों के लिए ठीक नहीं.

“फिर हमें क्या करना चाहिए जिससे दोनों सामान्य हो सके?” उसकी सास ने कहा
“माँजी मुझे ऐसा लगता है कि मैंने भी अनजाने मे ही सही उसके साथ कुछ अच्छा नहीं किया.” वर्तिका ने कहा
“तो अब क्या करना चाहिए?” उसकी सास ने कहा.
“माँजी ऐसा करिए इन दोनों को एक सप्ताह के लिए कहीं बाहर घूमने के लिए भेज दीजिए, दोनों थोड़ा घर के वातावरण से दूर साथ-साथ समय बिताएंगे तो उनका मन स्वतः ही ठीक हो जाएगा.” वर्तिका कुछ देर रुकी फिर बोली, “माँजी मैं इनसे कहकर कल इन दोनों का शिमला का टिकट करवा दे रही हूँ, आप ही उन दोनों को वहाँ जाने के लिए बोलिएगा.”
“ठीक है.”

अगली सुबह रुचिका को उसकी सास ने अपने कमरे मे बुलाकर कहा,” रुचिका, दिनेश से कहकर मैंने तुम्हारे एवं रवि के लिए शिमला का टिकट बुक करवा दिया है, रवि ने एक सप्ताह की छुट्टी भी ले ली है तुम दोनों जाकर घूम आओ.’
सहसा रुचिका को विश्वास ही नहीं हुआ कि उसकी सास क्या कह रही हैं . वह बोली “माँजी
मैं अकेले नहीं जाऊँगी आप लोग भी चलिए.“
“अरे तुमलोग जाओ बहुत दिन से कहीं घूमने-फिरने नहीं गए हो.” उसकी सास ने कहा.
“तो वर्तिका दीदी को चलने के लिए कहिए।“ रुचिका बोली.
“इस बार तुमलोग जाओ अगली बार हमलोग कहीं और का प्लान बनाकर साथ-साथ चलेंगे.” वर्तिका ने कहा.
अगले दिन रवि और रुचिका फ्लाइट से शिमला के लिए रवाना हुए. दोनों बहुत खुश थे.
दोनों ने एक सप्ताह का समय खूब इन्जॉय किया, रुचिका का मन अब काफी ठीक था. एक सप्ताह बाद जब दोनों घर लौटे तो उसका मन बहुत हल्का एवं प्रफुल्लित था. घर आने के बाद ऐसा लग रहा था कि जिंदगी की “सबसे बड़ी खुशी” उसे मिल गई हो. वर्तिका ने उसे छेड़ा भी था “रुचिका कैसी रही ट्रिप, खुशखबरी कब सुना रही हो तुम.”
उसकी बात सुनकर रुचिका जोकि अब पूरी तरह सामान्य हो चुकी थी, शर्मा गई थी और कुछ भी नहीं बोल पाई थी.

प्रेषक
रामाश्रय प्रसाद बरनवाल
वरिष्ठ प्रबंधक
इंडियन बैंक,इलाहाबाद
पारलिआमेंट स्ट्रीट शाखा ,नई दिल्ली-110001
मोबाईल नो- 7042409880

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