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लघु कथा -ऑक्सीजन

 raksha14
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दिल्ली जैसा ‘बड़ा शहर’ और उसकी भीड़-भाड़ से भरी, सांसों की मोहताज तंग गलियां, जहां तो बड़े-बड़े चौराहे भी ऑक्सीजन को तरस रहें है। हर दिन लंबा ट्रैफिक जाम होना आम बात है। किसी को फर्क पड़े न पड़े, लेकिन रंग-बिरंगी महंगी गाड़ियों से गुलजार, हाय रे ये हताश चौराहे ! काला धुंआ उगलती गाड़ियों को ये कितनी ही बार लाल आंखे दिखाएं, थम जाओ, लेकिन जमीन से मात्र दो-चार इंच ऊंचे ये धृष्ट कदम, हवा से बातें करने की आतुरता में सबको कुचलते आगे बढ़ते चले जाते हैं ।

सिग्नल के ‘लाल रंग’ की आभा, खासकर तपती दोपहर में अपने पूरे जोश के साथ सभी के मन-मस्तिष्क को अपने रंग में रंग लेती है। तब कोई छू जाए जनाब, आंखे चार हुई नहीं कि आंखें लाल होते देर नहीं लगती, सूरज फिर प्रकाश देता है ये लाल आंखे अंगारे उगलने लगती है। हरा रंग!! आसान नहीं है, हरियाली तो स्याह कर दी, फिर भला पत्ते हरे होने की उम्मीद भी कैसे कर लेते हैं। रंग तो वैसे भी चंद मुट्ठी भर लोगों की कैद में छटपटा रहें हैं।

दिल्ली का ऐसा ही एक भीड़ भरा चौराहा जिसके किनारे एक साइकिल-स्कूटर पंचर वाले की दूकान या उससे मिलती जुलती संकल्पना क्योंकि वो दुकान की परिभाषा के दायरे में नहीं आती। खैर, उसकी दूकान लाल बत्ती से कोई एक-डेढ़ किलोमीटर पहले थी, लड़का-सा दिखने वाला दूकानदार? जिसे कभी हंसी-ठिठोली करते या गाड़ियों के भीतर झांकते हुए नहीं देखा, न ही मोबाइल में आंख गढ़ाए, और ना ही कभी दुकान ताशबाजी का अड्डा बनती नजर आई।

हाँ, कभी-कभी एक सात-आठ साल का छोटा बच्चा नीली वर्दी में बैठा रहता, दोनों चुपचाप कुछ ना कुछ अपने को व्यस्त-से दिखाते, खोये हुए से| बगल में पेड़ पर टायर लटके थे, जिस पर ‘शायद किसी देवी माता की लाल चुन्नी बांधी हुई थी, मानो आस्था का यही ‘लाल रंग’ उसकी जिन्दगी की गाड़ी आगे बढ़ा रहा था। लाल बत्ती पर अक्सर कोई हवा भरवाने, पंचर लगवाने, छोटे मोटे काम के लिए रुक ही जाता, पानी देख जैसे प्यास लग जाती है, लाल बत्ती देख मानो टायर पर बंधी लालचुन्नी उन लोगों को इशारे से बुला लेती है।

लाल बत्ती आज हर शहर की समस्या से ज्यादा आदत बन चुकी है, जिसे हम बस निभाते चले जा रहे हैं और इस थमी हुई लाल बत्ती के तले खड़े ये चौराहे, गाड़ियों से रिसने वाले काले धुंए को सोखने के लिए अभिशप्त हैं। इसी धुंए में अपना ‘ऑक्सीजन’ स्वयं निर्मित करने वाला वो लड़का-सा दिखने वाला दुकानदार अपना काम में लीन रहता। लाल बत्ती की लालिमा आज कुछ ज्यादा ही प्रकोप दिखा रही थी, लगातार बजते हॉर्न के बीच भी बहस-बाजी की तेज आवाजे कानों में पड़ रही थी।

इस बीच ऑटो से झांका तो देखा कि दो लोग उस लड़के से बहस कर रहे हैं, न जाने किस बात पर बहस चल रही है, दो बार लाइट लाल हो चुकी थी और “ये लो तीसरी भी हो गई” गाड़ी कुछ कदम ही आगे खिसक पाई थी। कुछ-कुछ समझ में आया स्कूटर पर ‘विराजमान’ जो सम्भवतः अपना काम करवा चुके थे। उसे 10 रुपये देना चाहते हैं जबकि उसके अनुसार टायर फट गया था “तीन जगह पंचर लगे हैं और 30 रुपये लगेंगें।

एक हाथ से ‘गद्दी थामे’ पर गद्दी पर से लगभग उछलता हुआ वह चिल्लाकर बोला सड़क किनारे तुम कमीने लोग खुद जानबूझ कर कील फेंक देते हो ताकि हम जैसों के टायर पंचर हो और तुम्हारी कमाई हो। वह दृढ़ता से बोला एक तो आप गाली देकर बात न करो। यह 10 रुपये भी ले जाइए पर बेईमानी का इल्जाम मत लगाओ। उसके शब्द प्रयोग चौंकाने वाले थे, इतने में लाल बत्ती खुल गई वो 10 रुपये फेंक तेजी से पलायन कर गये।

इस बीच उनकी आस्था को ठेस लगी और स्कूटर पर बंधी लालचुन्नी ने मानो लाल बत्ती को इशारा किया और ये दुकानदार भाईसाहब की आवाज लगाता भागा आ रहा है, शायद 10 रुपये वापस करने या अपने अधिकार के पैसे मांगने, अरे भाई साहब देख तो लीजिए” स्कूटर वाला विवशता छिपाते हुए, बाजू ऊपर करता हुआ उतरा, लालबत्ती की भीड़ से घिरा था इसलिए सुनकर भी अनसुना न कर सका। अपना हेलमेट तो लेते जाइए आगे मामू पकड़ लेंगे तो 500 रुपये मांग लेंगे उनसे तो आप बहस भी नहीं कर पायेंगे।

आगे वाले ने तो हेलमेट लगाया हुआ था अपने सर पर हल्के से हाथ रखते हुए दबी आवाज में बोला अरे बाप रे कहते हुए हेलमेट लगभग छीन लिया पर समझ नहीं आ रहा था। इसको धन्यवाद कहूं या क्या कहूं, जेब से 50 रुपये निकाल कर लड़के को दे दिए तो लड़के ने भी पलट कर तुरंत 20 रुपये उसके हाथ में थमा दिए और वापस लौट गया। कार्बन के बीच जाने क्यों ‘ऑक्सीजन’ कौन सा सुकून हुआ। ऑटो वाला हंसने लगा “मैडम यही वे लोग है, जिनकी ईमानदारी पर यह दुनिया चल रही है, और उन्हें देखो दो पहिया स्कूटर पर हवा में उड़तें हैं। जमीन को कुछ समझते ही नहीं”।

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