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आलोचना से अवमानना कैसे?

इत्यादि

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सुबह सुबह नाश्ता बनाने के लिए उठी। सब्जी बनाने के लिए जैसे ही टोकड़ी उठायी तो गोभी और बंदगोभी में वार्तालाप चल रहा था। मैं ठिठक कर सुनने लगी ,उन दोनों की वार्ता। गोभी -“एक बात मेरे समझ में नहीं आ रही है कि ‘किसी की आलोचना से अवमानना कैसे हो सकता है?
अपना अपना मत है, कोई चीज किसी को अच्छी लगती है तो किसी को बुरी।

मान लो कि किसी की बात मुझे अच्छी नहीं लगी तो मैंने उस बात की आलोचना कर दी, तो क्या हुआ? हम स्वतंत्र देश के नागरिक हैं। अपने मन की बात कहना हमारा अधिकार है , फिर इतना हाय तौबा क्यों?

अगर भिंडी ने कह ही दिया कि ‘न्यायपालक उचित न्याय नहीं करते तथा आलू के पीछे बाइक पर बैठ कर घूमता है और अपना कार्य सही तरह से नहीं करता है, भ्रष्टाचार का उन्मूलन नही करता, न्यायप्रणाली में भी गड़बड़ी होने से यदि कह ही दिया तो ऐसी क्या आफत आ गई। माना कि ‘आम ‘ राजा है , इसका मतलब यह तो नहीं कि भगवान् हो गया। हम सभी मिलकर ही तो काम करते हैं। भगवान् को भी लोग नहीं छोड़ते तो सामान्य लोगों की क्या बिसात।

अपने ही लोगों में बैगन को देखो रात दिन कटहल को गाली देता रहता है जबकि कटहल कितना गुणवान है। कच्चा भी उपयोगी है,  बीज के संग नेढ़ा भी काम का है, पकने के बाद तो और भी काम की ,लेकिन कितना सुनना पड़ता है उसे। वैसे ही आलू के कारण ही हमारी कौम परचम लहरा रहा है फिर भी उसके ऊपर पैर धर लोग अपना काम करते हैं, उसके बिना हम सब्जियों की कोई अस्तित्व नहीं है फिर भी उसके दादा जो इस धरा के लिए सब कुछ अर्पित कर दिया, उसे मृत्यु के उपरान्त भी कुछ लोग अपमानित करते हैं।

महान सपूत टमाटर ने कितना योगदान दिया है। उसके वंशज के महान सपूत को नहीं छोड़ते तो यदि भिण्डी सच बोल ही दिया तो उसे दण्डित करना अशोभनीय है। कोई भी सजा देना अति निन्दनीय है।

मुझे लगता है कोरोना जैसे महामारी से सबक नहीं लिया है अभी तक। अकारण भिंडी को मात्र सत्य संभाषण के लिए अवमानना नहीं हुआ।
सत्य कटु होता है। यह बात अक्षरशः सत्य प्रतीत हो रहा। हमारी एकता ही हमारी शक्ति थी। आज एकता तो दूर की बात है। अब तो अपने भाई भी भाई को देखना नहीं चाहते। गन्दी और सस्ती राजनीति कर मानव के हित का हनन हो रहा है। फिर भी किसी को चिन्ता नहीं। चिन्ता है तो अपने खोखले सम्मान की। बिना कारण दोषी बना कर उसके कहे गये वाक्यों पर माफी मंगवाना। नहीं मांगने पर सजा देना।

मुझे तो भिंडी का माफी न मांगना उचित लग रहा है।
कोई भी भगवान नहीं जो सजा मुकर्रर कर दे। ईश्वर तो अपनी सन्तान को कभी भी दंड नहीं देता फिर उसके बंदे को किस बात का घमंड। मेरी समझ से परे है।

बंदगोभी -“भाई आपकी बात सही है। सोलहो आने सच। खूनी, बलात्कारी, चोर ,डकैत आदि तो ऐसे ही घूमते हैं पर अपने मन की बात कहने वाले को माफी मांगने के लिए कहना तथा अस्वीकार करने पर सजा देने की पहल, मेरी दृष्टि में अनुचित है। सच में घोर कलयुग है।

गोभी ने कहा आजकल की स्थिति में बहुत पहले पढ़े एक कहानी की स्मृति हो आयी है। एक व्यापारी के दुकान पर एक लड़का कुछ खाने के लिये मांग रहा था। व्यापारी के नहीं देने पर ‘डबल रोटी ‘चुरा कर भाग गया। उस व्यापारी यानी दुकानदार के आदमियों ने उसकी बहुत पिटाई की।

पंचायत बुलाई गयी। पञ्च ने पूछा लड़के से कि ‘चोरी क्यों की ?
लड़के ने कहा कि बाल्यकाल में ही पितृसुख से वंचित हो गया था। माँ घर घर काम कर हमदोनों का पेट पालती है। कुछ दिनों से बुखार है उसे। जिनके घर काम करती थी, उन सबसे भी माँगा खाना। किसी ने कुछ नहीं दिया। बहुत लोगों से विनती की तो निराशा के अलावा कुछ नहीं मिला। सेठ जी देंगे इस आशा से मांगने गया था। नहीं देने पर चोरी करनी पड़ी।

‘पञ्च ने ध्यान से सुना और कहा चोरी करनी गलत बात है,लेकिन किसी भूखे को खाना नहीं देना तो अति निंदनीय ही नहीं घोर अपराध है। अतः सबको भुगतान करना पड़ेगा। यहाँ उपस्थित सभी को ५००, ५०० रुपये देने होंगे और सेठजी को ५००० देने पड़ेंगे। एक भूखे को पिटवाना लज्जाजनक है। साथ में जहाँ बच्चे की माँ नौकरी करती थी। सबको पूरे महीने की तनख्वाह देनी होगी। ऊपर से सबको अस्पताल का खर्चा देना होगी क्योंकि आपके घर जो काम करता है। वह सदस्य हो जाता है परिवार का।’ पञ्च परमेश्वर की जयकार से सम्पूर्ण वातावरण गुँजायमान हो गया।

बहुत देर से चुप बैगन ने कहा कि याद है एक बड़े महाजन की बेटी भाग कर दूसरे कौम में विवाह कर ली। महाजन क्रोधित थे। अपने मातहत कर्मचारियों को कोर्ट ले गए। सेवकों ने बेटी और दामाद के विरुद्ध बोला। एक महीना भी व्यतीत नहीं हुआ, ‘बाप बेटी मिल गये। उस समय कोर्ट में संग देने वाले मातहतों को दुष्ट निर्लज्ज महाजन ने नौकरी से निकाल आश्रयहीन कर दिया।

बंद गोभी ने कहा ‘-हाँ, स्मरण हो आया। कितने लोग विकल हो यहीं आकर अपने आप को कोसते थे कि क्यों दुष्ट का संग दिये। ‘अतः इन मानवों के पचड़े में पड़ना ही नहीं। इनके खेल निराले हैं। ये कब क्या करेंगे किसी को कुछ पता नहीं। छोड़ो इन स्पंदनहीन मानवों को। अपना सुनाओ सब ठीक है न। सभी प्रसन्न हो न।
हम अपने जीवन में खुश हैं भगवान न करे इन मानवों का संग हो।

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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