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अंगदान महादान

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angdanदान शब्द का शाब्दिक अर्थ है – देने की क्रिया. दान शब्द अति महनीय शब्द है. ‘देना’ शब्द परम संतुष्टि प्रदान करता है. दान के बदले किसी प्रकार का विनिमय नहीं हो सकता.किसीको अगर हम कुछ देतें हैं जिसे उसकी अत्यन्त आवश्यकता थी तो उसे परम संतोष होता है और उससे दाता को परमानन्द .
दान के विविध रूप हैं . धन दान , धर्म दान ,क्षमा दान, अभय दान ,विद्या दान, अंगदान एवं देह दान. विद्या दान सबसे सुखकर दान है. क्षमा दान तो आत्म दान ही है. किसी भी जरूरतमंद को सहायता देना , उसको उसके कष्ट से निकलने हेतु कुछ भी देना दान है. सभी दान की अपनी अपनी विशेषताएं हैं लेकिन अपना अंग दान देना किसी मानव के प्रति बहुत बड़ा उपकार है, अंग दान से जीवन दान मिलता है. अतः यह सभी दानों में सर्वोपरि है.
यदि हम आँख दान करते हैं तो अंधे को दृष्टि मिलती है और वह दाता के दान से संसार को देख पाता है. वास्तव में अंग दान महादान है. अंगदान देना बहुत बड़ा पुण्य का काम है. परापूर्व काल से अंगदान देने की परंपरा रही है. यह परंपरा सतयुग से चला आ रहा है. अंगदान जैसा महादान मुक्ति में बाधक नहीं अपितु सहायक है. मृत्युपरांत अपने अंग का दूसरों द्वारा प्रयोग होने के कारण आप किसी न किसी रूप में जीवित ही रहते हैं. और धार्मिक लोग यह कहते हैं की आत्मा अमर होता है, यह नश्वर शारीर तो आत्मा का चोला मात्र है, मृत्यु और जन्म वैसे ही है जैसे हम कपडे बदल लेते हैं. आत्मा एक पुराना शारीर छोड़ कर नए शारीर को अंगीकार कर लेता है. अब अगर यह सच है तो फिर अंग तो आत्मा के चोला का एक इकाई मात्र है , जैसे कपडे का बटन,या नाड़ा, या कॉलर या कफ इत्यादि. अब अगर आपका कोई कपड़ा पुराना हो जाता है और आप उस कपडे को किसी जरूरतमंद को दान कर देते हैं तो आपका क्या बिगड़ेगा, या आपका क्या हानि होगा. इतना ही नहीं मान लीजिए उस कपडे का जो आपकेलिए पुराना हो चूका है और उसका आपके लिए कोई प्रयोग नहीं रह गया है तब यदि कोई उसका बटन काटकर अपने कपडे में लगाकर अपने कपडे को पहनने योग्य बना लेता है तो आपका तो कुछ नहीं बिगाड़ा पर उस व्यक्ति का कपड़ा पहनने लायक हो गया. इसी तरह अंग दान देने से आपके आत्मा का पुराना चोला का कुछ भाग दूसरों द्वारा प्रयोग में लाने से आपको तो ख़ुशी ही मिलनी चाहिए और यही ख़ुशी तो परमात्मा को प्राप्त करना है.
कुछ लोग यह दुर्विचार से ग्रसित हैं की अंग दान देने के बाद अगले जन्म में उस अंग से वंचित होना पड़ेगा. अंग भंग होने के बाद संस्कार होगा तो मुक्ति नहीं मिलेगी ! यह निराधार दुष्प्रचार है. क्यों कि मृत्यु तो इसलिए होता है की आपके आत्मा को नया चोला चाहिए. ठीक वैसे ही जैसे आपका कपड़ा फट जाये या पहनने लायक न रहे तो आप दूसरा नया कपड़ा लेते हैं. अब जब आप नया कपड़ा लेंगे तो वह पुराना जैसा फटा तो नहीं लेंगे न ! अतः अंग दान देने के बाद जब आपका आत्मा नया चोला (शारीर) अंगीकार करेगा तो उसको पुराने या त्यजित चोला से क्या प्रयोजन होगा . अतः यह भ्रम है कि अगले जन्म में आप उस अंग से च्युत रहेंगे जिस अंग को आप ने दान कर दिया है. angdan images
धार्मिक अज्ञानता और दान की महत्ता की नासमझी के कारण लोग अंग दान की महनीयता नहीं समझ पा रहे हैं. शास्त्रों में वर्णित है कि अंगदान करने वालों उत्तम लोक , पुण्य, धर्म मिलता है. प्राचीन काल में कई ऐसे महा दानी हुए हैं . देह दान या अंग दान करने वालों को सम्मान मिलता था , भगवत्कृपा मिलती थी. जब वृतासुर ने देवताओं को अत्यन्त कष्ट देकर स्वर्ग में उनका रहना कठिन बना दिया था तो ब्रह्माजी के निर्देशानुसार इन्द्रादि देवताओं ने महाप्रतापी यशस्वी महर्षि दधीचि से उनका देह दान में लेकर उनकी हड्डियों से विश्वकर्माजी द्वारा वज्र बनवाकर वृतासुर का बध किया . लोककल्याण हेतु दधीचि ने देह दान दिया और फलतः दधीचि अमर होगये.उन्होंने अपने जीवित शारीर का त्याग कर अपना अंग कल्याण हेतु दान दे दिया तो मरणोपरांत अगर हम अपना अंग दान करदें और किसी की भलाई हो तो हमें और कुछ नहीं सोचना चाहिए.
इसी तरह पूर्व काल के राजा शिवि की कहानी भी है. एक कबूतर की जान बचने हेतु वे अपने जीवित शारीर को गिद्ध के लिए परोस दिया था. उनका त्याग देखकर परीक्षा लेने आये कबूतर के रूप में सूर्य और गिद्ध के रूप में इंद्र अपने असली रूप में प्रकट हो कर राजा शिवि की स्तुति की . यहां देखने योग्य बात यह है की राजा शिवि द्वारा कबूतर की जान बचाने हेतु अपने देह का दान देने की बात से ही ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई की सूर्य और इंद्र जैसे प्रतापी शिवि की स्तुति करने लगे.
राजा ययाति की कथा भी है जिसमें उनके पुत्र पुरु ने अपना यौवन पिता को दान में दे दिया और पुनः जब ययाति सन्यास लेने लगे तो वह यौवन अपने पुत्र पुरु को लौटा दिया.
अब गौर करने वाली बात है कि जिस देश में कबूतर की जान बचाने के लिए कोई राजा अपना शारीर दान कर सकता है , असुरों से रक्षार्थ कोई महर्षि अपना देह दान कर सकता है और अपने पिता के लिए कोई अपना यौवन दान कर सकता है उस देश के लोग इस भ्रम में कैसे रह सकते हैं कि अंग दान या देह दान से मुक्ति में बाधा मिल सकता है? अतः यह भ्रम है . अंग दान से बड़ा दान हो ही नहीं सकता. आवश्यकता है जागरूकता की और शास्त्र को समझने की .
अंगदान और देह दान अलग अलग है. शारीर के उपयोगी अंग जैसे की आँखें , कॉर्निया,लीवर ,हड्डी,स्किन ,फेफड़ा,गुर्दा, हार्ट (दिल),टिश्यू (ऊतक) इत्यादि दान करना अंग दान है और अपना सम्पूर्ण शारीर मेडिकल प्रयोग या अध्ययन के लिए दान देना देहदान है. एक व्यक्ति के मृत्युपरांत अंग दान से कई व्यक्तियों के चिकित्सा किये जा सकते हैं और इस तरह कई लोग लाभान्वित हो सकते हैं. और एक देहदान से कई या अनगिनत लोगों का कल्याण हो सकता है. मेडिकल की पढाई में मृत देह अतिउपयोगी होता है. प्रयोग हेतु मृत देह का उपयोग करने से कई व्यक्तियों का सर्जरी एवं अनेक तरह की चिकित्सा में विकास सम्भव होता है.
अभी कुछ दिनों पहले की बात है प्रधान मंत्री श्री मोदी जी ने भी लोगों से ‘मन की बात’ के माध्यम से अंगदान को महादान बताया था. बस पाखण्ड को दूर करने की आवश्यकता है. निश्चितरूपेण दधीचि ,पुरु के वंशज अपना अंग दान करेंगे ही. बस जगाना है मानव को. मुझे पूर्ण विश्वास है कि देशवासी निश्चितरूप से अंग दान और देह दान कर मानव कल्याणार्थ चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के लिए आगे आएँगे ही बस अलख जगाना है, जागरूकता फैलाना है, भ्रम मिटाना है.

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