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क्या इंदिरा के राजनैतिक वारिश बन पायेंगे राहुल?

anurag

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2015-04-30_173056अगर अतीत के पन्नों पर नजर दोहरायें तो हम पायेगें कि इतिहास खुद को दोहराता है। ये दोहराव हर स्तर पर होता है। ऐसी ही एक दोहराव भारतीय राजनीति के पृष्ठ पर होता नजर आ रहा है। इस दोहराव है में छुपी है कांग्रेस की राजनैतिक पृष्ठभूमि जिसमें अर्श से फर्श पर जाने और फिर फर्श से अर्श तक पहुचनें के प्रमाण विद्यमान है।

ये प्रमाण है कांग्रेस की इंदिरा सरकार जिसने 1975 में अपातकाल लगा दिया था। आपात काल के परिणाम स्वरूप जनता में एक भयानक रोष ने जन्म लिया और जब इस गुस्से की जानकारी इंदिरा तक पहुँची तो उन्होने 1977 में दोबारा लोकसभा चुनाव करायें। इस चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से परास्त हुई और उसें मात्र 153 सीटें मिली। काग्रेंस को 197 सीटों का भारी नुकसान हुआ। और उस समय ये कहा जाने लगा था कि ये काग्रेंस का पतन काल है।

पर समय के साथ राजनीति के चक्र ने करवट बदली और 2002 के लोकसभा चुनाव में बाजपेयी सराकार को परास्त कर कांग्रेस सत्ता के सिहांसन पर विराजमान हुई और पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव तक वो सत्ता पर आसीन रही। यानि वो दस साल सत्ता में रही।

2014 के चुनावों में मोदी लहर के सामने कांग्रेस की करारी हार हुई। 1977 के चुनाव में 153 सीटें पाने का आकंडा 44 सीटों पर आकर सिमट गया। और एक बार फिर तस्वीर वही बनी जों 1977 के लोकसभा चुनावों में बनी थी। एक फिर भारतीय राजनीति के चणकयों द्वारा काग्रेंस के पतन की भविष्यवाणी की जाने लगी थी जो अब राहुल गांधी की सक्रियता के साथ कुछ हद तक थमती नजर आ रही है।

इस स्तर पर 22 मार्च 1977 के इंदिरा गांधी के उस कथन पर भी गौर करना होगा जिसमें अपनी हार को स्वीकार करतें हुए इंदिरा ने कहा था कि “मैं और मेरे साथी पूरी विनम्रता से हार स्वीकार करते हैं। कभी मुझे लगता था कि नेतृत्व यानी ताकत है। आज मुझे लगता है कि जनता को साथ लेकर चलना ही नेतृत्व कहलाता है। हम वापसी करेंगे।” और वाकई इंदिरा ने बड़ी ताकत के साथ वापसी की।

इतना ही नही अपनी हार के साथ ही इंदिरा ने किसानों के बीच अपनी सक्रियता बढायी थी ठीक उसी तरह जैसे आज राहुल गांधी विदर्भ में पदयात्रा कर किसानों के बीच अपनी सक्रियता को बढा रहें हैं। खुद कांग्रेस अध्यक्षा सोनीया गांधी भी किसानों के मुद्दे पर पूरी तरह से सक्रिय है।

दरसल किसानों के दर्द को अपना दर्द बताकर कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी के आम आदमी के उस तिलिस्म को तोंडना चाहती है जिसके दम पर मोदी सत्ता कें गलियारों तक पहुचें है और शायद इसलिए आम आदमी के दिलों तक पहुचनें के लिए राहुल गांधी हवाई जहाज की मुफीद यात्रा को छोडकर ट्रेन के जनरल डिब्बों में सफर कर आम आदमी से सीधा संवाद स्थापित कर रहें है और उनके दिलों में उतरने का प्रयास कर रहें है।

राहुल जानतें है कि मोदी को परास्त उन्ही की शैली में किया जा सकता है इसीलिए वो संसद के अन्दर से लेकर सडक तक उन्ही मुद्दों को चुन रहें जिसका इस देश के आम आदमी से सीधा सम्बन्ध हों। वो हर स्तर पर यह प्रयास कर रहें है देश की आम जनता से उनका सीधा भावनत्मक लगाव हों जैसा कि वर्तमान में मोदी के साथ है।

राहुल गांधी के सियासी करियर की बात करें तो 2004 में वह पहली बार सांसद बने थे। जनवरी 2013 में उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया। लेकिन वे 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय से पार्टी में सक्रिय हैं। तब से लेकर अब तक देशभर में लोकसभा चुनाव सहित 20 चुनाव हुए। 6 राज्यों में कांग्रेस अपनी सीटें बढ़ाने में कामयाब रही। लेकिन उसे 5 चुनावों में ही जीत मिली। लोकसभा चुनाव सहित 15 राज्यों में पार्टी हारी है।

यह बात सही है कि एक दशक के मनमोहन के शासनकाल में राहुल की हैसियत पार्टी में सिर्फ सांसद भर की रही, लेकिन ये राहुल की अपनी कमजोरी थी। दस साल का समय राजनीति में अपनी हैसियत बनाने के लिए कम समय नहीं होता वो भी तब जब पार्टी की कमान उनकी मां सोनिया गांधी के हाथों में हो।

बहरहाल, उक्त तमाम चुनौतियों को स्वीकार कर राहुल गांधी कितना इस देश के आम आदमी सें अपने रिश्ते को जोड पाते है यह देखना जरूर रूचिकर होगा। पर इन सब के बीच एक बात जो अटल सत्य है वो यह कि “परिवर्तन समय की नीति” है। और सत्ता की प्राकृति में भी ‘परिवर्तन” समाहित है।

इसलिए आने वाले समय में काग्रेंस मोदी सरकार की गलत नीतियों के आधार पर इतिहास को दोहरा दे तो उसमें कोई अचरच की बात नही होगी वैसे भी भूमि अधिग्रहण बिल को लाकर मोदी सरकार ने कांगेंस को बैठे-बैठायें इस देश के 67 फीसदी किसानों से जुड़ने का सीधा अवसर उपलब्ध करा दिया है।

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