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किसान, सरकार और मुट्ठीभर ‘उद्योगपति दलाल’

anurag

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आज फिर एक किसान ने आत्महत्या कर ली। आज फिर एक परिवार अनाथ और बे-सहारा हो गया और सरकारें ख़ामोशी के साथ चैन की बंशी बजा रही है। कोई भी सरकार किसानो की आत्महत्या की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। कोई कह रहा है कि किसानो की इस दुर्दशा के लिए राज्य सरकार जिम्मेदार है तो कोई कह रहा है केंद्र सरकार। जबकि वास्तविकता इससे बिलकुल इतर है।

दरासल किसानो की दुर्दशा के लिए सरकारें नहीं बल्कि इस देश के राजनैतिक दल जिम्मेदार है। सवाल सिर्फ हाल में आई एक प्राकृतिक विपदा का नहीं है बल्कि इससे पहले भी तमाम बार किसानो के संवेदनशील मसलो पर सत्ता में बैठे राजनैतिक दल किसानो को ठगते चले आये है जिनमे सबसे महत्वपूर्ण मुदा चीनी मिल मालिको दवारा गन्ना किसानो के शोषण का भी है। यदयपि की ये मुद्दा राज्य की अखिलेश सरकार का विषय है लेकिन फिर भी इसमें केंद्र की मोदी सरकार को जोड़ना जरुरी है क्योकि किसानो के सच्चे हितैषी होने का दावा ये भी करते है।

आज तक कोई भी सरकार वो चाहे केंद्र की हो या फिर राज्य की, चीनी मिल मालिकों को गन्ना किसानो का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं कर पाई है। अखिलेश सरकार की लाख घोषणाओं और मोदी सरकार के हर स्तर पर मदद के वायदे के बाद भी आज तक हजारों गन्ना किसानो को उनके गन्ने का भुगतान नहीं मिल पाया है। अलबता कुछ चीनी मिलें तो गन्ना मूल्य भुगतान की जगह पर गन्ने के बदले चीनी देने पर अड़ी है।

ऐसे में बरसात के रूप में आई प्राकृतिक विपदा ने किसानो की पूरी कमर तोड़ रख दी है। हर तरफ कोहराम मचा है| खेतो में सडती अपनी फसल को देख किसान निराश है और आत्महत्या को मजबूर है।

ये कैसी विडम्बना है कि जो देश की सत्ता को निर्धारित करता है सत्ता उसी के प्रति उदासीन हो जाती है। क्यों इस देश सत्तर फीसदी किसानो का वोट लेने वाले राजनैतिक दल सरकार में आते है मुट्ठी भर के उद्योगपतियों के गुलाम बनकर रह जाते है?

दरसल ये पूरा मामला ठीक उसी तरह है जैसा मोदी सरकार के मंत्री ने कुछ दिन पहले अपने बयान में कहा था। मोदी सरकार के दिग्गज मंत्री और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी.के.सिंह ने कहा था कि मीडिया एक वेश्या है।

बात जनरल वी.के.सिंह ने बिलकुल सही कही थी पर इसमें एक तथ्य को जोड़ना वो भूल गएँ है, वो ये कि अगर मीडिया वेश्या है तो उन वेश्यों की सरगना इस देश की राजनीति और उसके राजनेता है क्योकि वेश्यावृत्ति की शुरुवात कैसे की जाती है ये राजनेता ही सिखाते है।

जिस तरह जिस्म की मंडी में बैठी वेश्या की हर रात की कीमत दलाल पहले से तय रखता ठीक उसी तरह सत्ता में बैठे वेश्यारूपी राजनीतिक दल के हर दिन की कीमत दलाल रूपी उयोग्पति चुनाव के समय ही तय कर देते है। ऐसे में सत्ता में बैठे हर राजनैतिक दल को सिर्फ उद्योगपतियों से मतलब होता है। क्योकि उद्योगपतियों से मिलता है पैसा, पैसे से मिलती है सत्ता और सत्ता से फिर मिलता नंबर दो का पैसा।

यही कारण की सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्य की, उसकी नीतियों और योजनाओ में उद्योगपतियों को लाभान्वित करने की झलक साफ़ दिखाई पड़ती है। इस स्तर जनकवि अदम कि इन लाइनों का उल्लेख आवशयक है कि “जो डलहौजी न पाया ये हुक्काम कर देंगे कमीशन दो तो हिन्दुस्तान को नीलाम कर देंगे”

रहा सवाल किसानो का, तो वो तो सीधे साधे गंवई है जब चुनाव आएगा तो ये राजनैतिक दल फिर कोई न कोई नया चुनावी तुर्रा फेक देंगे क्योकि उद्योगपति तो सिर्फ नोट देता है वोट तो इन्ही बेवकूफों से मिलता है।

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