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भाव की बूंद

मेरे अनुभव, मेरे लेख

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रमा की शादी को 4 साल हो चुके हैं। एक उन्मुक्त विचार व स्वतंत्र लड़की ने जीवन के इस दौर को सबसे कठिन माना है। 20वीं सदी में जन्मी व 21 वीं सदी के माहौल में पली रमा एक सशक्त व्यक्तित्व होने के साथ ही स्वभाव से बेहद करुणामयी व उससे ज्यादा संवेदनशील है, शायद इसकी वजह 20वीं सदी और 21वीं सदी की करवट को कहा जा सकता है। खैर, यह बदलाव यहां पर समाप्त नहीं होता, जैसा कि यह कथन यर्थाथ है कि परिवर्तन ही संसार का नीयम है, रमा में भी बदलाव आए हैं। इन चार सालों में जीवन व संबंधों के असल सत्य (जो कड़वा होता है) से वह इस तरह दो-चार हुई है, कि उसे इस सत्य को परिस्थितियों का खेल या फिर अमोघ प्रेम का अमलिजामा पहना कर निभाने में ही समझदारी लगती है।

इस बदलाव को अपने भीतर समेटे हुए रमा न ही केवल अपनी गृहस्थी संभाल रही है, बल्कि ऐसी स्थिति में जमाने की भागदौड़ में भी अपने जीवनसाथी होने का हर कदम पर फर्ज निभाती है। सुबह से शाम तक बाहर भीतर की भागदौड़, अपनी शारीरिक समस्याएं और छुट्टी के दिन घर की देखरेख के चक्रव्यूह में उसका समय निकल रहा है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से रमा कुछ ज्यादा ही ठीक नहीं है, दिल, दिमाग, सेहत सब उथल-पुथल कर रहे हैं। फिर भी वह इन सब चीजों को किनारे करते हुए किसी न किसी चीज में लगी रहती है। उसकी चीढ़न अब उसके चेहरे और चुप्पी में झलक रही है, लेकिन उसे समझकर तवज्जो देने वाला कोई नहीं है। इतने पर भी वह बिना पूछे इसे जाहिर नहीं करना चाहती।

आज तो हाथ पैरों का दर्द मानो उसे पीछे की ओर खींच रहा है। ऐसे में भी वह कभी बस, कभी आॅटो कभी पैदल हांफते हुए अपने दफ्तर पहुंच ही रही थी, कि अचानक उसका पैर एक सीढ़ी से नीचे उतरते हुए मुढ़ जाता है, रमा गुटनों व हाथ के बल गिरती है, फिर जैसे-तैसे अपना पर्स समेटते हुए वह आगे बढ़ती है, लेकिन अब उसकी चाल धीमी वह लचक रही है, शायद पैर में मोच आ गई है। दफ्तर पहुंचते ही उसकी मुलाकात गीता से होती है।

गीता एक सभ्य व हसमुख महिला है, वह भी सुबह दफ्तर खुलने के साथ ही सफाई करने अपनी रोजी पर पहुंच जाती है। पिछले दो साल से रमा व गीता एक दूसरे के आमने-सामने आ ही जाते हैं, गीता हर बार हस कर, सर हिलाते हुए दबी जुबान में ’नमस्ते’ कहती है, व रमा भी उसी अंदाज में उसे नमस्कार करती है। लेकिन आज रमा की लचकती चाल पर गीता ने पूछा ’मैडम, क्या हुआ’, रमा पहली बार गीता से नमस्ते के अलावा ऐसा कुछ सुनकर थोड़ा अचंभित, लेकिन भावों को सामान्य करते हुए बोली ’कुछ नहीं, बस पैर मुड़ गया है ’, गीता तुरंत बोली ’यहां सरसो का तेल है क्या? लेकर आती हूं’।

 

रमा के हां या न कहने तक गीता रसोई में चली गई। रमा अपनी कुर्सी में आकर सिस्टम आॅन कर बैठी ही थी कि इतने में गीता सरसो का तेल व उसमें नमक घोलकर ले आई। यह देख रमा ने खुश होकर कहा ’बहुत बहुत धन्यवाद’, इतना कहा ही था, कि गीता अचानक पैर मोढ़ नीचे बैठ गई व कहने लगी ’दीदी, किस पैर में लगी है।’’ रमा को एकाएक कुछ समझ न आया वह बोली ’सीधे पैर पर’… इससे पहले कि वह और कुछ कह पाती गीता ने रमा का दर्द भरा पैर अपनी गोद में रख उस पर तेल व नमक का लेप मलना शुरू कर दिया। रमा ने कहा ’अरे, रहने दो मैं कर लूंगी, आप ले आए इतना ही बहुत है’ लेकिन गीता अपने हाथ चलाती रही वह करुणाभरे शब्दों में बोली ’कुछ नहीं होता, बस आप बताओ दर्द तो नहीं हो रहा न’’ यह सुनते ही रमा कि आंखे भर आई, वह जी भर के अंतर मन से अपने ईश्वर से गीता के सारे कष्ट दूर करने की प्रर्थना करने लगी। मानो क्षणभर के लिए ही सही, लेकिन उसे ऐसे ही निस्वार्थ भाव कि प्यास थी, जिससे वह अब तक अपनों के घड़े भरती आई है, लेकिन आज पहली बार निश्छल भाव की एक बूंद उसे गीता से मिली।

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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