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तन स्वदेशी मन विदेशी

chalti zindgi
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तन स्वदेशी मन विदेशी
आज आजादी के 67 साल बीतने के बाद भी देश में भाशा को लेकर रार मची है। भारत अभी यही तय नहीं कर पाया कि उसकी आधिकारिक भाशा क्या हो? यह राश्ट्रीय शर्म की बात है कि जिस मुद्दे को बहुत पहले सुलझा लिया जाना चाहिए था उसमें हमने 67 साल खपा दिए फिर भी नतीजा जीरो है।
कहने को तो हिंदी को राश्ट्रभाशा का दर्जा मिला हुआ है लेकिन उच्चस्तर पर आज भी यह सरकारी कामकाज की भाशा नहीं बन पायी है। ऐसे स्तरों पर अंगे्रजी का काबिज होना यह साबित करता है कि हमारे नीति नियंताओं ने हिंदी को सर्वमान्य भाशा बनाने का जो सपना देखा था वह अभी भी सपना ही है। शायद उनकी मंशा इसलिए सफल नहीं हो पाई क्यों कि आजादी के बाद शासन तंत्र जिन लोगों के हाथ में रहा वे तन से तो स्वदेशी थे लेकिन मन से विदेशी। इन्होंने विदेशी भाशा की उन्नति में ही अपना हित देखा।
आज जब देश की सर्वोच्च परीक्षा में सी सैट के अंग्रेजी पेपर का विवाद गरमाया हुआ है तो इस बात पर विचार करना आवश्यक हो जाता है कि अंग्रजी ‘ज्ञान’ को ज्ञान की कसौटी कैसे मान लिया जाये। जिस देश की 90 फीसदी जनता हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाशायें बोलती या समझती हो वहां की प्रशासनिक सेवा को अंग्रजी में प्रवीणता की क्या आवश्यकता है? यूं तो किसी भी भाशा को जानना, समझना, बोलना बुरा नहीं लेकिन उसे अनिवार्य बना देना किसी भी दृश्टि से उचित नहीं। यह सोंचने का सही वक्त है देश में आयोजित होने वाली अन्य अनेक परीक्षाओं में भी अंग्रेजी की अनिवार्यता क्यों बरकरार है।

आपके विचारों का स्वागत है।

फोन्ट सपोर्ट न मिलने को खेद है

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