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..यह जनरल डिब्बा है साहब।

Humanity Speaks

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हैवी रेलवे ट्रैफिक और पटरियों के भारी भरकम मकड़जाल के चलते भारतीय रेल अपने आप में एशिया महाद्वीप की सबसे बड़ी रेल व्यवस्था है। मगर एक सच यह भी है कि भारतीय रेल की छवि अब तक न तो भारतीयों की नज़रों में उतनी अच्छी रही है और न ही विदेशी पर्यटकों की नज़रों में। ऐसा नहीं है कि इंडियन रेलवे की इमेज को सुधारने के लिए काम नहीं किए गये। कितने ही रेल मंत्री आये और चले गये लेकिन रेलवे की इमेज में अब तक कोई खास बदलाव नहीं ला पाये।

2010 में कानपुर में शुरू हुई सैटेलाइट इमेजिंग फॉर रेलवे नेविगेशन SIMRAN ( जिसकी मदद से आज आप रेलवे ट्रैफिक की इन्टरनेट पर रियल टाइम जानकारी निकाल सकते हैं ) और रेलवे स्टेशनों व गाड़ियों में मॉर्डन सुविधाऐं देने की कोशिशों के बावजूद 150 करोड़ की इस आबादी को संतुष्ट कर पाना संभव नहीं हो सका है। रेलवे आज भी अपनी खूबियों से ज्यादा अपनी लेट लतीफी और घटिया कैटरिंग सुविधा के लिए जानी जाती है। एक मज़ेदार तथ्य यह भी है कि चीन में जहाँ ट्रेन के मात्र 3 मिनट लेट हो जाने पर ड्राइवर को सस्पेंड कर दिया जाता है, वहीं भारत में ट्रेन यदि 18 घंटे लेट भी है तो भी ट्रेन को रद्द नहीं किया जाता है और न हीं किसी पर कोई खासी कार्यवाही की जाती है।

रेलवे की संम्पत्ति को नुकसान पहुँचाना तथा रेल में फैली गंदगी को लेकर हालाँकि यात्री भी बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। लेकिन एक हकीकत यह भी है कि अंग्रेजों के समय में बनी जनरल बोगी की व्यव्स्था आज भी बदली नहीं हैं। जनरल डिब्बा आम तौर पर किसी भी ट्रेन में इंजन के बाद पहली बोगी और ट्रेन के आखिर में गार्ड से ठीक पहले की या अंतिम बोगी होती है। अंग्रेजों के समय में बनी यह व्यवस्था यह सोच कर बनाई गई थी कि किसी भी दुर्घटना की स्थिति में सर्वाधिक नुकसान रेल के पिछले तथा अगले हिस्से को ही होता है। अतः आम तौर पर महत्वपूर्ण लोगों को बीच की बोगियों में बिठाया जाता था।

यह एक कड़वी सच्चाई है कि जहाँ भारतीय रेल मंत्रालय लगातार रेलवे का स्तर उठाने की बातें करता रहा है वहीं जनरल डिब्बे में सफर करने वाले आम आदमी को हमेशा से हाशिए पर धकेला जाता रहा है। जनरल बोगी में सफर करने वाला इंसान भेड़ बकरियों की तरह सफ़र करने को मजबूर होता रहा है। जनरल डिब्बे में सुविधाएं बढ़ाने की तो बात छोड़िए रेलवे ने इनकी संख्या तक बढ़ाने की कभी ज़रूरत नहीं समझी गई।

जनरल डिब्बे की टिकट के लिए आज भी काउंटर पर सबसे लम्बी लाइन लगती है। कई लोग गरीबी के चलते तो कई पहले से रिज़र्वेशन न होने की मजबूरी में जनरल का टिकट खरीद कर यात्रा करते हैं। ऐसा नहीं है कि कुछ किया नहीं जा सकता, पर सवाल यह है कि जिस आम आदमी को सैकड़ो आश्वासन देकर नेता और मंत्री वोट मांगते हैं आखिर उसी आम आदमी की राहत का ख्याल सबसे आखिर में क्यों रखा जाता है? ट्रेन में फुटबोर्ड पर बैठ कर सफर करना अपराध है, जिसके लिए रेलवे एक्ट-1989 में सज़ा का प्रावधान भी है। जनरल डिब्बे में यह कानून जम कर तोड़ा जाता। मगर सोचने की बात यह है कि लोग ऐसा करने पर मजबूर क्यों हैं। ट्रेन के सभी डिब्बे आपस में इंटरकनेक्टेड होते हैं लेकिन जनरल डिब्बे को एक दम अलग-थलग रखा जाता है। यदि किसी भी तरह की दुर्घटना अथवा आपातकाल की स्थिति बनती है तो ऐसे में न तो चिकित्सीय सुविधाएं और न हीं रेलवे सुरक्षा बल जनरल डिब्बे तक पहुँच सकता है। शायद यही वजह है कि ट्रेन में होने वाली ज्यादातर डकैतियों में लुटेरों का निशाना जनरल डिब्बे ही होते हैं। अब क्या कीजिएगा? जनरल डिब्बा है साहब।

रेल मंत्रालय को यह बात समझनी होगी कि भारतीय रेल से सबसे ज्यादा नाखुश यदि कोई है तो वह अर्थव्यवस्था के आखिरी छोर पर बैठा व्यक्ति ही है। और यदि रेलवे की सूरत को बदलना है तो सबसे पहले इस बदहाल स्थिति को बेहतरी की दिशा में उन्मुख करना होगा।

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