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‘contest’ हिन्दी हमारा अभिमान

Social issues
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हमने अपने जन्म उपरांत अपनी बालअवस्था में किलकारियों के साथ-साथ जिन शब्दों व भाषा का उद्घोष किया वो है हिन्दी, जिसने रिश्ते-नातो, समाज के ताने-बाने और ज्ञान-विज्ञानं को परिभाषित किया वो है हिन्दी, हमे अपनी भावनाओ व विचारो को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करने में सहज सहयोग का माध्यम बनने वाली भाषा है हिन्दी, हमारी अस्मिता और संस्कृति की प्रतिक है हिन्दी | हिन्दी भाषा देवनागरी लिपि के उतराधिकारी होने के नाते हम गर्व एवं सम्मान के साथ ‘हिन्दी’ को कोटि- कोटि नमन करते है | जब हम अपने से भिन्न किसी भी संस्कृति के संवाहक से संवाद करते है तो हमे पहले अपनी संस्कृति, भाषा (हिन्दी) का परिचय देना चाहिए, तभी उनकी हमारी भाषा के प्रति सम्मान एवं जिज्ञासा की भावना जागृत होगी और तभी अन्य भाषा के प्रतिनिधि संवाहको को अपनी भाषा के साथ -साथ, हिन्दी भाषा की उपयोगिता का ज्ञान होगा एवं देश की राजभाषा हिन्दी का अस्तित्व और अधिक सशक्त होगा | जितना सम्मान हम अपने राष्ट्र में अतिथि भाषा को प्रदान करते हुए अपने संबोधन से परिचय तक में उसका प्रयोग कर करते है यदि वही प्रयोग हम अपनी राजभाषा हिन्दी का करें और हिन्दी को सायबर जैसे छेत्रो में प्रोत्साहन दे तो निश्चित ही ‘हिन्दी’ भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अतिशीघ्र प्रसंसनीय एवं स्वीकार्य बन सर्वस्पर्शी हो जाएँ | लेकिन हिन्दी को अन्य राष्ट्रों की भाषाओ के अपेछाकृत, खुद अपनों से ही दो-चार होना पड़ रहा है और ये कारण सिर्फ हमारा पाश्च्यात सभ्यता से प्रभावित होना नहीं, बल्कि मुख्या कारण है संवेधानिक व सामाजिक रूप से हिन्दी की अवहेलना, कारण है हमारे समाज में दिच्छा से दैनिक कार्यो के अंतर्गत हिन्दी के वनस्पत, अतिथि भाषा का प्रयोग, छमा के स्थान पर सॉरी और धन्यवाद के स्थान पर थैंक्स का उच्चारण कर अपनी प्रतिभा का बनावटी प्रदर्शन पत्राचार, व्यापार, विज्ञापन आधुनिक संयंत्रो में हिन्दी का आंशिक हस्तछेप एवं उनके द्वारा संचालित सायबर छेत्रो में हिन्दी भाषा को भी देवनागरी के स्थान पर अंग्रेजी लिपि में लिखना जिस कारण हिन्दी व उसकी व्याकरण के स्वरूप तक का उत्खनन हो रहा है जो अतिथि भाषा के पीछे लकीर के फ़क़ीर की भांति भागने वाले ही नहीं अपीतु हिन्दी के प्रेमियों को भी सामान्य लगे किन्तु इन सभी गतिविधियों, क्रियाकलापों का प्रभाव हमारी नन्ही पौध व युवा पीढ़ी पर हिन्दी के प्रति उदासीनता के साथ सहजता से देखा जा सकता है, कारण है हमारी संसद द्वारा हिन्दी को उच्चारण एवं लिपि के रूप में संवेधानिक रूप से आवश्यक एवं बाध्य न किया जाना है, हिन्दी को व्यापक एवं अनिवार्य बनाने के लिए यदि हमने सामान्य से विशेष हर स्तर पर श्रदा व सम्मान के साथ ‘हिन्दी’ का प्रयोग नहीं किया तो हमें हिन्दी के उत्थान को शायद अभी और तपश्या करनी होगी!

-पं विकास शर्मा

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