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करोना डर या हकीकत

Pratusha

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मन की बंधी उमंगे असहाय जल रही है, अरमान आरजू की लाशें निकल रही है,

भीगी खुली पलकों में राते गजारते हैं, सोती वसुंधरा जब तुमको पुकारते हैं।

क्यों है यह कोलाहल, हाहाकार मचा हुआ है, भय रूपी दानव हमें निगलता चला जा रहा हैI

 

दोस्तों मैंने यह महसूस किया है कि, करोना सिर्फ एक अदृश्य जीवाणु ही हैI वह यदि हमारे शरीर में प्रवेश भी करता है तो उसे बल हमारा  रूपी राक्षस ही देता हैI और पूरे शरीर पर उसका कब्जा हो जाता है हमारा दिमाग, हमारे शरीर को कुछ संकेत भेजते हैं, शरीर पर दिमाग शासन करता है और दिमाग पर मन और मन पर हमारे विचारI मन का आचरण उसको दी गई सूचनाओं से बनती हैं यदि हम कुछ खराब समाचार सुने, जो सिर्फ नकारात्मक समाचारों से भरा हुआ है वह मन पर प्रभाव डालती हैं और हमारा मन,  विचारो को उत्पन्न कर देता हैI

अष्टावक्र गीता में कहा गया है,

मुक्ताभिमानीमुक्तोहिबद्धोबद्धाभिमान्यपिI
किंवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत् ॥ ११ ॥

जैसी मति वैसी गति I यह सच है कि ये एक नया रोग है, परंतु हमें उसका पूरा परिचय हैI हम सतर्कता ले सकते हैं, उपचार कर सकते हैं और उससे खुद को मुक्त कर सकते हैंI हमें पता है कि सिर्फ घरेलू उपचार और थोड़ी सी दवाइयां लेकर भी एक सामान्य व्यक्ति ठीक हो सकता हैI  कुछ लोग जो क्रिटिकल हैं उन्हें विशेष उपचार की जरूरत हैI

संकल्प की शक्ति से कैंसर जैसे रोग भी ठीक हो जाते हैं, तो यह कौन सी बड़ी बला है, यदि हम सचेत रहें अपना उचित समय पर ध्यान रखें और सबसे महत्वपूर्ण, “आशावादी” रहे “सकारात्मक” रहे, तो यह जल्द ही ठीक हो सकता हैI हमारी संकल्प शक्ति, हमारी मति को बदल सकती है और मति हमारी गति कोI महापुरुषों का कथन है, “हमारा वर्तमान समय, हमारी सोच का रूपांतरण है”I

हमें डर से डरना चाहिए क्योंकि यह हमारे दिमाग पर पूरी तरह हावी होकर हमारी रोगों से लड़ने की शक्ति को घटा देता है और हमारा शरीर समर्पण कर देता हैI

प्लेसिबो इफेक्ट का तो पता है ना केवल मनोवैज्ञानिक रूप से मरीज सोचता है कि वह दवाई खा रहा है और वह ठीक हो जाता है I यह प्लेसिबो है, “हमारा संकल्प” I एक संकल्प और सकारात्मक विचार हमारी डर रुपी अज्ञानता के राक्षस को मार सकती है I

भय किस बात का यह प्रश्न है? मृत्यु का, तो मृत्यु तो है हि नही I केवल जीवन ही जीवन है I हमारी आत्मा को यह शरीर केवल कुछ वर्षों के लिए ही तो मिला है, यदि हम यहां कुछ उद्देश्य से आए हैं, वापस तो आत्मा को अपने घर ही जाना है I यदि  आपने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया तो आपका आधा भय समाप्त हो जाएगा, हम यदि स्वयं को समझ ले तो आधी समस्या खत्म I इससे हमें बल मिलता है कि फिर हम बाकी सभी चीजों को लघु मानते हैं, चाहे सुख हो दुख हो, चाहे कोई बीमारी ही क्यों ना हो I और जैसे ही मन यह समझ लेता है कि मैं एक शक्तिशाली, सर्वथा रहने वाला शुद्ध चेतन युक्त आत्मा हूं, तो वैसे ही शरीर में एक विशेष हार्मोन बनते हैं जो हमारी रिकवरी रेट को कई गुना बढ़ा देते हैं I

क्योंकि जब तक हमारा मन, मस्तिष्क, किसी रोग की अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं किया तब तक उसे वह प्रभावित भी नहीं कर सकती ऐसे में रोगी की 99% चांसेस है कि वह जल्द से जल्द ठीक हो जाएगा I

हम सभी व्यक्तिगत रूप से ब्रह्मांड की एक इकाई है, हम में से प्रत्येक व्यक्ति अपने विचारों से उसे प्रभावित कर सकता है, “जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि” तो यदि हम  ही हमारे वर्तमान परिस्थिति के लिए उत्तरदाई हैं तो हम चाहे तो इसे परिवर्तित भी कर सकते हैं I एक विचार को परिवर्तित करना पड़ेगा I

अपने भय को खत्म करने के लिए आप क्या कर सकते हैं ?

1 सुबह उठने के बाद पहला विचार सकारात्मक और सबसे ज्यादा पावरफुल हो I हम जैसा सोचते हैं हमारा मस्तिष्क उसी सोच को हमारे शरीर में ट्रांसमिट करता है और उसे सच बनाने में लगा रहता है तो ऐसे में हमें सोच समझकर, सोचना चाहिए, हमारा एक नकारात्मक विचार, हमारे लिए आत्मघाती हो सकता है I

  1. ग्रिटीट्यूड अपनाते हुए सूरज को नमस्कार करें, यदि आप ऐसा नहीं कर सकते, तो आप जब भी जागते हो केवल आसमान की तरफ देखकर उसे नमन कर सकते हैं I
  2. आप को जो मंत्र अच्छे लगते हैं उनका उच्चारण कर सकते हैं I मंत्र शब्दों का एक शक्तिशाली यंत्र है, जो ध्वनि तरंगे हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करता है I ओम का उच्चारण कर सकते हैं, अन्यथा यदि आप दूसरे धर्म से संबंध रखते हैं तो अपने धर्म के हिसाब से उनके मंत्रों का इस्तेमाल कर सकते हैं I
  3. आजकल हमें सबसे सोशल मीडिया, फोन पर व्यस्त रहते हैं I हम सर्वथा इसी में व्यस्त रहते हैं, हम दूसरों से बात करते हैं, संबंधियों से बात करते हैं, समाचार सुनते हैं और हमेशा बाहर ही व्यस्त रहते हैं I कभी हमने अपने अंदर भी झांक के देखा है ? अपनी आत्मा से बात किया है, हमारा कभी भी स्वयं से वार्तालाप हो ही नहीं पाता I हम केवल शरीर ही नहीं बल्कि शरीर, मस्तिष्क और आत्मा का जोड़ हैं I जब तक हम अपनी आत्मा से संबंध स्थापित नहीं करेंगे तब तक हमारे अंदर बैलेंस नहीं बन सकता है I आत्मा से संबंध के लिए ध्यान केवल 5 मिनट से ही शुरुआत की जा सकती है I

5. स्वयं को रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखें जैसे खाना बनाना, बागवानी करना, नृत्य, गायन, पेंटिंग इत्यादि

 

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्‍वयं उत्तरदायी हैं, जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़ों की पुष्टि नहीं करता है।

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