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बेर खट्टे हैं !

Digital कलम

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हमको भी बचपन से क्या कहत हैं, वो फेमस होने का बड़ा ही शौक था परन्तु किस्मत ही बुड़बक निकली कि साला मौका ही नहीं मिला । अब हम ठहरे जंगल के आधे जंगली, हमें पूछता भी कौन ।

एक दिन हमारे गाँव के एक बुजुर्ग बाबा, जो ज्यादा ही बुढवा गए थे, उम्र की वजह से या उपदेश देते-देते, कहना बहुत मुश्किल है, उन्होंने फ्री वाला ज्ञान बाँटा कि सुदामा ने चावल का एक-आध दाना क्या श्री कृष्ण को खिलाया कि उनका नाम वेद-पुराणों में दर्ज हो गया । ऐसे ही शबरी के बेर श्री राम के साथ-साथ तुलसी दास को भी इतने भाए कि उन की तारीफ में राम चरित मानस में एक पूरा अध्याय ही लिख डाला ।

यह सुन कर हमारी बुद्धि खिसक गयी । गंगा बह रही है बगल में और खोज रहा है बाबला गंगोत्री में । हम भी चावल का दाना और बेर लेकर बैठ गए, अरे फेमस होने के लिए, बताया तो था पहली ही लाइन में ।

अब साला प्रॉब्लमवा यह था कि कृष्ण या राम कहाँ से लाएं अपने गाँव में ? कलियुग में कंस या रावण खोजने चलते तो बहुत मिल जाते परन्तु वो क्यों हमारे चावल या बेर खाने लगे ?

फिर हमारे बारहवीं पास दिमाग में एक सुनामी विचार कुलबुलाने लगा । क्यों ना किसी नेता को बुला लाएं अपनी कुटिया रुपी झोंपड़ी में । भैया आज-कल तो नेता ही भगवान हैं । नेता हमारे घर आएंगे तो पीछे-पीछे टी.वी. चैनल वाली मैडम भी आ जाएंगी । यही एक रास्ता है भैया अब फेमस होने का ।

कुछ दिनों बाद…

बुढवा बाबा हमें मुंह लटकाए देख बोले कि काहे रे बैजू बाबरा नेता तो आ गया ना तुमरे घर में, टी.वी. पे फोटो भी आ गई, फेमस भी हो गया तू, फिर काहे जीभा लटकाए घूमत रहा।

अरे बाबा, बड़े चोर हैं आज-कल के ये नेता लोग भी । हम तो बेर और चावल लेके बैठे थे कि सुदामा या शबरी जैसा नाम होगा पर वो बड़बोला नेता तो अपना फाइव स्टार खाना साथ लेके आयत रहा ।

बुरा हुआ रे बबुआ तेरे साथ । अच्छा बेर मीठे हैं क्या ? हैं तो मुझे ही दे दे, मैं ही चबा लूँगा ।

 – प्रशांत सिंह

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