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प्रधान सेवक जी, जनता जवाब मांगे..

कुछ कहना है ©
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आ ज कल दुनिया में हो हल्ला मचा हुआ है। एक ओर जहां दुनिया आतंकवाद से बिलख रही है वहीं भारत धर्मवाद से तड़प रहा है। अभी ऊबर कांड का जिन्न शांत नहीं हो पाया था कि देश में धर्मांतरण का मुद्दा बहस का मुद्दा बन गया। अचानक उपजे इस ‘घर-वापसी’ कार्यक्रम को लेकर जहां एक ओर विपक्षी दलों के नेता सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं प्रधानमंत्री मोदी की खामोशी बहुत कुछ बयां कर जाती है। इस पूरे प्रकरण पर मोदी ने शुरू से लेकर अब तक कोई सार्वजनिक खंडन नहीं किया है। इस शोर-शराबे के बीच सवा सौ करोड़ लोग मोदी को ताक रहे हैं लेकिन मोदी बगलें झांकते नजर आ रहे हैं। देश में धर्म के नाम पर हो रहे तांडव पर हिंदुस्तान की आवाम को जब मोदी की सख्त जरूरत है तब मोदी की ये खामोशी समझ से परे है। आम चुनावों के पहले रैलियों-मंचों से दहाड़ते मोदी के रूप में जनता को एक ऐसा शख्स नजर आ रहा था जो जाति, धर्म इत्यादि से परे विकास, एकजुटता, भाईचारे की बात कर रहा था। दशकों से चली आ रही जाति -धर्म की सियासत से ऊब चुके लोगों को मोदी में नई किरण दिखाई दे रही थी। ऊंचे- ऊंचे मंचों से माइक पर गरजते मोदी ने जनता को भरोसा दिलाया था कि वह सुशासन को देश के एजेंडे पर लाकर रख देंगे। लेकिन समय के साथ चुनाव से पहले किए गए सारे वादे कदम-दर-कदम खोखले साबित होते जा रहे हैं। चुनाव के पहले करोड़ों लोगों के लिए सुपरमैन का अवतार बन चुके मोदी की दशा इस समय एक पीआर कंपनी के एजेंट सी हो गई है। जो देश विदेश में घूम-घूम कर ‘भारत ब्रांड’ के लिए बिजनेस जुटा रहा है। मोदी के हाथों में सत्ता की बागडोर सौंपते समय जनता ने जिस ‘सियास’ से मुक्त होने का सपना देखा था, आज उन्हीं मोदी के प्रधानमंत्री रहते हुए देश में धर्मांतरण जैसा ‘कृत्य’ खुलेआम हो रहा है। सरकार की सह पर आरएसएस और विहिप देशभर में तथाकथित घर वापसी को सरेआम अंजाम दे रहे हैं। मोदी के इस छोटे से शासन काल में ही ‘लव जिहाद’, ‘बहू बनाओ-बेटी बचा’ और घर वापसी जैसे मामलों की फेहरिस्त मोदी को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। मंत्रियों-सांसदों की भड़काऊ बयानबाजी से त्रस्त जनता को अब सिर्फ देश के प्रधानमंत्री के जवाब का इंतजार है। ऐन मौके पर उनकी खामोशी अखरती है।

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