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ओली की बोली

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नेपालियों के अपने राम हैं,
लंका के हैं रावन।
ऐसी खबरों को सुनकर ही
बीत रहा है सावन।।
राम कहां के सब जाने हैं,
ओली को क्यों भ्रम है।
या ओली की आड़ में छुपकर,
चीन कह रहा हम हैं ।।
शी जनपिंग की खोली से,
क्यू बोल रहे हैं ओली।
बोली के अल्फाजों से क्यों,
दाग़ रहे हैं गोली।।
ओलीजी क्या भूल गए हैं,
बचपन की वो होली।
या इनको अब याद दिलाएं,
तिलकोत्सव की रोली।।
वामपंथ का भूत जो इन पर,
रातों रात चढ़ा है।
इनके जैसे कईयों को,
हमने शीशे में मढ़ा है।।
राम नाम का जप करना है,
इसमें कुछ न बुरा है।
पर ये आपके चीनी “बीन” का,
राग बड़ा बेसुरा है।।
रोटी – बेटी के रिश्ते में,
झंझट क्यों करवाते हो।
सांस ले रहे भारत से फिर,
गोली क्यों चलवाते हो।।
पद की अपने लाज बचाकर,
भी तो तुम रह सकते हो।
तुमको कुछ दिक्कत हो तो,
तुम हमसे भी कह सकते हो।।
तुम नेपाल हो हम भारत,
ये भूगोल बताता है।
पर याद रहे तुम जब भी चाहो,
भारत में रह सकते हो।

……… प्रद्युम्न पाण्डेय

 

 

 

डिस्क्लेमर : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण जंक्शन किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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