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पेड़ की छाल से पत्तों और फिर कपड़े से स्क्रीन पर पहुंची चिट्ठी, जानें डाकसेवा की शुरुआत और सफलता की कहानी

Rizwan Noor Khan

9 Oct, 2020

संदेश या चिट्ठी पहुंचाने की व्यवस्था आधुनिक समय में व्यवस्थित रूप से शुरू हुई है और आज तकनीक के सहारे और तेज हो गई है। प्राचीन समय में ऋषि मुनि पेड़ के पत्तों या छाल पर संदेश लिखकर भेजते थे जो राजा महाराजाओं के समय में कपड़े पर लिखा जाने लगा। 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस के मौके पर जानते हैं डाक सेवा की शुरुआत और सफल होने की कहानी।

कपड़े पर लिखे जाते थे संदेश, ले जाते थे पक्षी
जब से मानव इस धरती पर आया है वह ​कम्यूनिकेशन के लिए अलग अलग माध्यमों, तरीकों का इस्तेमाल करता रहा है। भारत में डाकसेवा को व्यवस्थित करने में अंग्रेजों का बड़ा हाथ माना जाता है। डाकसेवा के इतिहास में जाएं तो पता चलता है कि अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत के अलग अलग हिस्सों में राजाओं का शासन था जो कपड़े पर संदेश लिखकर भेजा करते थे। तब विशेष मौकों पर ही संदेशों का आदान प्रदान होता था। जबकि, पक्षियों को भी संदेश वाहक बनाने की कई घटनाएं आज भी प्रचलित हैं।

समय बचाने के लिए डाक सेवा की शुरूआत
सही वक्त पर संंदेश को पहुंचाने के लिए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी लॉर्ड क्‍लाइव ने 1766 में डाक व्‍यवस्‍था की शुरुआत कोलकाता में की। दो साल बाद अंग्रेज अधिकारी वॉरेन हेस्टिंग्स ने डाक सेवा को और विस्तार देने के लिए कुछ लोगों की नियुक्तियां कीं। कोलकाता के बाद अंग्रेजों ने 1786 में मद्रास में दूसरा डाकघर बनाया। डाक सेवा की सफलता के बाद 1793 में मुंबई में भी डाक कार्यालय स्‍थापित किया गया। 1854 में इन डाकघरों को राष्‍ट्रीय महत्‍व की प्रक्रिया मानकर संचार प्रणाली का मुख्‍य हिस्‍सा बना दिया गया।

1969 में जापान में विश्व डाक दिवस का ऐलान
17वीं सदी में ही दुनियाभर के कई देशों ने वैश्विक संचार व्‍यवस्‍था पर मंथन करने के बाद डाक सेवा शुरू कर दी। 1874 में विश्‍व समुदाय ने सेवा को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने और सरल बनाने के उद्देश्‍य से यूनीवर्सल पोस्‍टल यूनियन की स्थापना की। इसके लिए स्विट्जरलैंड में बड़े स्‍तर पर एक सम्‍मेलन हुआ,जिसमें तमाम देशों ने हिस्‍सा लिया। 1969 में डाक व्‍यवस्‍था के प्रचार प्रसार के उद्देश्‍य से जापान में हुए सम्‍मेलन में फैसला लिया गया कि प्रत्‍येक वर्ष 9 अक्‍टूबर को विश्व डाक दिवस मनाया जाएगा।

रेलडाक और मनीऑर्डर सेवा ने क्रांति ला दी
भारत में डाकसेवा की सफलता के बाद पहली बार 1863 में रेल डाकसेवा का शुभारंभ क्रांतिकारी कदम बना। 1873 में चिट्ठियों को रखने के लिए खूबसूरत और नक्‍काशीदार लिफाफों आने लगे। 1880 में डाकसेवा से रुपयों के आदान प्रदान के लिए मनीआर्डर सेवा की शुरू की गई। यह सेवा अपनी शुरुआत से ही डाकघर की सबसे ज्‍यादा प्रचलित सेवाओं में शुमार हो गई। इसके बाद पोस्‍टल ऑडर, पिनकोड व्‍यवस्‍था, डाक जीवन बीमा, स्‍पीड पोस्‍ट समेत कई तरह की सेवाओं की शुरुआत हुई।

दुनिया का सबसे बड़ा डाक नेटवर्क
विश्व डाक दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इंडिया पोस्ट की सेवाओं पर हम गर्व करते हैं। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि ‘महामारी के दौरान भी नागरिकों को शानदार सेवा देने के लिए दुनिया के सबसे बड़े डाक नेटवर्क इंडिया पोस्ट आफिस के सभी कर्मचारियों को बधाई। उन कर्मचारियों को श्रद्धांजलि जिन्होंने राष्ट्र की सेवा करते हुए महामारी के दौरान अपनी जान गंवाई।’…NEXT

 

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