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Former President Fakharuddin Ali Ahmed- फखरुद्दीन अली अहमद

Fakhruddin Ali Ahemadफखरुद्दीन अली अहमद का जीवन परिचय

भारत के पांचवें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद का जन्म 13 मई, 1905 को पुरानी दिल्ली के हौज काजी इलाके में हुआ था.  इनके पिता का नाम कर्नल जलनूर अली अहमद और दादा का नाम खलीलुद्दीन अहमद था. फखरुद्दीन अली अहमद के दादा गोलाघाट शहर के निकट कदारीघाट के निवासी थे, जो असम के शिवसागर में स्थित था. इनके दादा का निकाह उस परिवार में हुआ था, जिसने औरंगजेब द्वारा असम विजय के बाद औरंगजेब के प्रतिनिधि के रूप में असम पर शासन किया था. फखरुद्दीन अली अहमद न केवल एक नामी मुस्लिम घराने में पैदा हुए थे, बल्कि इनका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न और शिक्षा के प्रति जागरुक भी था. फखरुद्दीन अली अहमद का बचपन से ही खेलकूद के प्रति काफी रुझान था. स्कूल एवं कॉलेज स्तर पर उन्होंने हॉकी तथा फुटबाल में प्रतिनिधित्व किया. इसके अलावा वे टेनिस, गोल्फ और शिकार की भी रुचि रखते थे. फखरुद्दीन अली अहमद की प्रारंभिक शिक्षा उत्तर-प्रदेश के गोंडा जिले के सरकारी हाई स्कूल में हुई थी. मैट्रिक की परीक्षा उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की. उसके बाद फखरुद्दीन अली अहमद दिल्ली के प्रसिद्ध स्टीफन कॉलेज में दाखिल हुए. कुछ समय पश्चात ही वह उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैण्ड चले गए. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अंतर्गत इनका दाखिला सेंट कैथरीन कॉलेज में हो गया. 1927 में फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने स्नातक स्तर की शिक्षा तथा 1928 में विधि की शिक्षा संपन्न कर ली. विधि की डिग्री लेने के बाद जब वह भारत लौटे तो वह लाहौर हाईकोर्ट में वकील के रूप में नियुक्त हुए.


फखरुद्दीन अली अहमद का व्यक्तित्व

फखरुद्दीन अली अहमद एक अनुकरणीय व्यक्तित्व वाले इंसान थे. उनके व्यक्तित्व पर एक संपन्न परिवार से संबंधित होने की झलक साफ दिखाई पड़ती थी. वह हमेशा शोषण के प्रति आवाज उठाने के लिए तत्पर रहते थे. इसी उद्देश्य से उन्होंने मजदूर संघों का भी नेतृत्व किया. वह एक बेहद संयमित और अपने अपने लक्ष्यों के प्रति गंभीर व्यक्ति थे.


फखरुद्दीन अली अहमद का राजनैतिक सफर

1931 में फखरुद्दीन अली अहमद ने अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता प्राप्त कर ली. यहीं से उनके राजनैतिक जीवन की शुरुआत हुई. कुछ ही वर्ष बाद 1937 में वह असम लेजिस्लेटिव असेम्बली में सुरक्षित मुस्लिम सीट से निर्वाचित हुए. अभी तक वह एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में ही कार्य कर रहे थे. जवाहरलाल नेहरू की सलाह पर उन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर स्वयं को नामांकित किया था. जवाहरलाल नेहरू, फखरुद्दीन अली अहमद की कार्यशीलता से बहुत अधिक प्रभावित थे. जल्द ही अली अहमद को कांग्रेस की कार्य समिति का सदस्य बनाया गया. 1964 से 1974 तक वह कांग्रेस कार्य समिति और केन्द्रीय संसदीय बोर्ड में रहे. 1938 में जब गोपीनाथ बारदोलोई के नेतृत्व में असम में कांग्रेस की संयुक्त सरकार बनी तो फखरुद्दीन अली अहमद को वित्त एवं राजस्व मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया. वित्त और राजस्व विभाग का दायित्व संभालते हुए इन्होंने विशिष्ट एवं उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर ली थी. इनके नेतृत्व में राज्य की वित्तीय स्थिति में अपेक्षित सुधार भी हुआ. सत्याग्रह आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए अंग्रेजी सरकार ने फखरुद्दीन अहमद को जेल भी भेजा. 11 फरवरी, 1946 को जब गोपीनाथ बारदोलोई के नेतृत्व में असम में कांग्रेस की सरकार बनी तो इस बार के चुनाव में फखरुद्दीन अली अहमद को शिकस्त प्राप्त हुई. परंतु कांग्रेस के अनुरोध पर उन्होंने असम के एडवोकेट जनरल का पदभार संभाला और 1952 तक इस पद पर बने रहे. जल्द ही उन्हें असम सीट से राज्यसभा की सदस्यता प्राप्त हुई और वे संसद में पहुंच गए. 1957 में उन्होंने यू.एन.ओ में भारतीय शिष्टमंडल का नेतृत्व किया. इसके बाद फखरुद्दीन अली असम विधानसभा में निर्वाचित हुए और इन्हें असम राज्य की बड़ी ज़िम्मेदारियां दी गईं. अपने कार्यकाल के दौरान इन्होंने वित्त, कानून और पंचायत विभागों को संभाला. 1962 में यह पुन: असम विधानसभा में पहुंचे और इन्हें मंत्रिमंडल में स्थान भी प्राप्त हुआ. 29 जनवरी, 1966 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने फखरुद्दीन अली अहमद को संघीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया. इन्हें सिंचाई एवं ऊर्जा मंत्रालय का कार्यभार कैबिनेट मंत्री के रूप में प्राप्त हुआ. इस प्रकार असम राज्य का कोई व्यक्ति पहली बार केन्द्रीय मंत्री बनने में सफल रहा. जब इन्हें ‘यूनियन काउंसिल ऑफ़ मिनिस्टर्स’ में शामिल किया गया तो यह आवश्यक था कि इन्हें अगले छह माह में संसद के किसी भी सदन की सदस्यता दिलाई जाए. अत: अप्रैल 1966 में यह राज्यसभा में पहुंचे. इन्होंने शिक्षा मंत्री के रूप में भी 14 नवम्बर 1966 से 12 मार्च 1967 तक कार्य किया. 1971 के लोकसभा चुनाव में वह बारपेटा की सीट से निर्वाचित हुए. वे 3 जुलाई, 1974 तक खाद्य कृषि मंत्री के रूप में इनकी सेवाएं देते रहे. और आखिर में 25 अगस्त, 1974 को फखरुद्दीन अली अहमद को राष्ट्रपति पद प्राप्त हुआ.


फखरुद्दीन अली अहमद का निधन

11 फरवरी, 1977 को नहाते समय फखरुद्दीन अली अहमद को दिल का दौरा पड़ा जिसके कुछ ही समय पश्चात उनका देहांत हो गया. पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय जाकिर हुसैन के साथ फखरुद्दीन अली अहमद की गहरी मित्रता थी. दोनों ही भारत के राष्ट्रपति पद पर पहुँचे. यह संयोग ही था कि दोनों की मृत्यु राष्ट्रपति भवन के स्नानगृह में फिसलने के बाद हुई और दोनों की मृत्यु का कारण हृदयाघात रहा.


फखरुद्दीन अली अहमद को दिए गए सम्मान

राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की स्मृति को शाश्वत रखने के उद्देश्य से भारत सरकार ने इनके पोर्ट्रेट से युक्त डाक टिकट जारी किया.


फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में उर्दू को उचित सम्मान दिलाने के लिए विभिन्न स्तर कर कार्य किए. लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि कोई भी भाषा राष्ट्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा प्रचलित भाषा नहीं बनाई जा सकती, जबकि वह भाषा आम लोगों में प्रचलित न हो अथवा आम लोगों के संस्कारों में न हो. उस समय भाषा को लेकर जो आंदोलन किए जा रहे थे, उनके संबंध में फखरुद्दीन अली अहमद ने स्पष्ट चेतावनी दी कि भाषाओं को जबरन थोपना ठीक नहीं होगा. उन्होंने उर्दू भाषा को लेकर मुस्लिमों को भी सावधान किया कि मात्र उर्दू ही मुस्लिमों की भाषा नहीं है. किसी भी धर्म की कोई एक ही भाषा नहीं हो सकती. फखरुद्दीन अली अहमद जैसे राष्ट्रभक्त कभी भी विस्मृत नहीं किए जा सकते. वह भारत की धर्मनिरपेक्ष नीति के ज्वलंत उदाहरण के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे.


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