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जीवन में कभी चुनाव न हारने वाले करुणानिधि की लिखी वो फिल्म जिसे बैन करने की हुई थी मांग

Pratima Jaiswal

8 Aug, 2018

दक्षिण भारत की राजनीति में एक अलग मुकाम बनाने वाले द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के प्रमुख एम. करुणानिधि 94 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए. 50 साल पहले उन्होंने डीएमके की कमान अपने हाथ में ली थी. लंबे समय तक करुणानिधि के नाम हर चुनाव में अपनी सीट न हारने का रिकॉर्ड भी रहा. वो पांच बार मुख्यमंत्री और 12 बार विधानसभा सदस्य रहे हैं. अभी तक वह जिस भी सीट पर चुनाव लड़े हैं, उन्होंने हमेशा जीत दर्ज की. करुणानिधि ने 1969 में पहली बार राज्य के सीएम का पद संभाला था, इसके बाद 2003 में आखिरी बार मुख्यमंत्री बने थे. करुणानिधि के राजनीतिज्ञ सफर की तरह उनकी निजी जिंदगी भी चर्चा का विषय रही. आइए, एक नजर डालते हैं उनकी जिंदगी से जुड़ी खास बातों पर.

 

 

14 साल की उम्र में छोड़ दी पढ़ाई, लिखने लगे फिल्मों में स्क्रिप्ट
संध्या रविशंकर की लिखी किताब ‘करूणानिधि : ए लाइफ इन पॉलिटिक्स’ के अनुसार महज 14 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ करुणानिधि सियासी सफल पर निकल पड़े. दक्षिण भारत में हिंदी विरोध पर खुलकर बोलते हुए करुणानिधि ‘हिंदी-हटाओ आंदोलन’ का नेतृत्व करने लगे. 1937 में स्कूलों में हिन्दी को अनिवार्य करने पर बड़ी संख्या में युवाओं ने विरोध किया, इस विरोध में करुणानिधि भी उनमें से एक थे. इसके बाद उन्होंने तमिल भाषा को अपने विचार फैलाने का जरिया बनाया और तमिल में ही नाटक, अखबार और फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट लिखने लगे.

 

 

1952 में बनी ‘पराशक्ति’ जिसे बैन करने की हुई थी मांग
करूणानिधि : ए लाइफ इन पॉलिटिक्स’ में उनकी फिल्मी जिंदगी के बारे में एक किस्सा लिखा है. करुणानिधि ने 1952 में आई फिल्म ‘पराशक्ति’ की स्क्रिप्ट लिखी. इसमें शिवाजी गणेशन पर्दे पर पहली बार उतरे. जिनकी दमदार एक्टिंग ने दर्शकों का दिल जीत लिया.
दूसरे विश्वयुद्ध पर आधारित कहानी में हिन्दू धर्म में प्रचलित कई अंधविश्वासों पर कटाक्ष करती हुई फिल्म विवादों में घिर गई थी.
फिल्म को दीवाली के आसपास 17 अक्टूबर 1952 में रिलीज किया गया था, जिसकी वजह से इस फिल्म का विरोध काफी तेज हो गया था. कई हिस्सों में इस फिल्म को बैन करने की मांग हुई.

 

फिल्म के क्लाइमेक्स में कोर्टरूम का सीन बहुत मशहूर हुआ. जिसमें धर्म से जुड़े अंधविश्वासों और राजनीतिज्ञ महत्वकाक्षाओं की बलि चढ़ती आम जनता पर कई दमदार डायलॉग बोले गए थे. करुणानिधि जातिवाद और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करने वाले सामाजिक सुधारवादी पेरियार के पक्के समर्थक थे. वो सामाजिक बदलाव को बढ़ावा देने वाली ऐतिहासिक और सामाजिक कथाएं लिखने के लिए लोकप्रिय रहे. राजनीति के अलावा उन्हें एक कलाकार की तरह भी देखा जाता है…Next

 

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