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राम मनोहर लोहिया ने महात्मा गांधी के कहने पर छोड़ दी थी सिगरेट, अंग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच सीखने के बाद भी नहीं छोड़ा हिन्दी का साथ

Pratima Jaiswal

12 Oct, 2018

देश की राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और स्वतंत्रता के बाद ऐसे कई नेता हुए जिन्होंने अपने दम पर शासन का रुख बदल दिया, जिनमें से एक थे राममनोहर लोहिया। देशभक्ति और समाजवादी विचारों के कारण वह अपने समर्थकों के अलावा विरोधियों को भी अपना मुरीद बना लेते थे।
आज उनकी पुण्यतिथि पर हम आपको बता रहे हैं, उनसे जुड़े हुए दिलचस्प किस्से।

 

 

 

महात्मा गांधी के कहने पर तीन महीने में छोड़ दी थी सिगरेट
राम मनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को फैजाबाद में हुआ था। उनके पिताजी हीरालाल पेशे से अध्यापक व हृदय से सच्चे राष्ट्रभक्त थे। उनके पिताजी गांधीजी के अनुयायी थे। जब वे गांधीजी से मिलने जाते तो राम मनोहर को भी अपने साथ ले जाया करते थे। इस वजह से लोहिया महात्मा गांधी के विचारों से काफी प्रभावित होते थे और महात्मा गांधी के व्यक्तित्व का उन पर गहरा असर हुआ।
कई किताबों में लोहिया और महात्मा गांधी से जुड़े कई किस्से मिलते हैं। एक किस्सा है राम मनोहर के सिगरेट पीने से जुड़ा हुआ। लोहिया का निजी जीवन भी कम दिलचस्प नहीं था। लोहिया अपनी ज़िंदगी में किसी का दख़ल भी बर्दाश्त नहीं करते थे। हालांकि महात्मा गांधी ने उनके निजी जीवन में दख़ल देते हुए उनसे सिगरेट पीना छोड़ देने को कहा था। लोहिया ने बापू को कहा था कि सोच कर बताऊंगा। और तीन महीने के बाद उनसे कहा कि मैंने सिगरेट छोड़ दी।

 

 

कई विदेशी भाषा जानते हुए भी कम नहीं हुआ हिन्दी प्रेम
1918 में लोहिया अपने पिता के साथ अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार शामिल हुए। बनारस से इंटरमीडिएट और कोलकता से स्नातक तक की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए लंदन के स्थागन पर बर्लिन का चुनाव किया था। लोहिया को देश और दुनिया के राजनीति की जितनी समझ थी, उससे ज्यादा वे भारतीय परंपराओं और भारतीय समाज को जानते बूझते थे, वे लगातार पढ़ने लिखने वाले राजनेता थे। लोहिया ने जर्मनी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की थी। ये कम ही लोग जानते होंगे कि वे अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, मराठी और बांग्ला धड़ल्ले से बोल सकते थे, लेकिन वे हमेशा हिंदी में बोलते थे, ताकि आम लोगों तक उनकी बात ज्यादा से ज्यादा पहुंचे।

 

 

समाजवाद पर राम मनोहर लोहिया के विचार
‘Ideas On Socialism and Social Justice’ किताब के मुताबिक डॉ राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि समाजवाद की दो शब्दों में परिभाषा देनी हो तो वे हैं- समता और संपन्नता। इन दो शब्दों में समाजवाद का पूरा मतलब निहित है। समता और संपन्नता जुड़वा हैं। उन्होंने समता हासिल करने के लिए 11 सूत्रीय कार्यक्रम देते हुए लिखा कि इनमें से हर मुद्दे में बारूद भरा हुआ है। वे सूत्र हैं- सभी प्राथमिक शिक्षा, समान स्तर और ढंग की हो तथा स्कूल खर्च और अध्यापकों की तनख्वाह एक जैसी हो। प्राथमिक शिक्षा के सभी विशेष स्कूल बंद किये जायें। अलाभकर जोतों से लगान अथवा मालगुजारी खत्म हो।
संभव है कि इसका नतीजा हो सभी जमीन का अथवा लगान का खत्म होना और खेतिहर आयकर की शुरुआत।
उन्होंने कहा कि पांच या सात वर्ष की ऐसी योजना बने, जिसमें सभी खेतों को सिंचाई का पानी मिले। चाहे वह पानी मुफ्त अथवा किसी ऐसी दर पर या कर्ज पर कि जिससे हर किसान अपने खेत के लिए पानी ले सके। अंग्रेजी भाषा का माध्यम सार्वजनिक जीवन के हर अंग से हटे। अगले 20 वर्षों के लिए रेलगाड़ियों में मुसाफिरी के लिए एक ही दर्जा हो। अगले 20 वर्षों के लिए मोटर कारखानों की कुल क्षमता बस, मशीन, हल और टैक्सी बनाने के लिए इस्तेमाल हो।  कोई निजी इस्तेमाल की गाड़ी न बने। एक ही फसल के अनाज के दाम का उतार-चढ़ाव 20 प्रतिशत के अंदर हो और जरूरी इस्तेमाल की उद्योगी चीजों के बिक्री के दाम लागत खर्च के डेढ़ गुना से ज्यादा न हों। पिछड़े समूहों यानी आदिवासी, हरिजन, औरतें हिंदू तथा अहिंदुओं की पिछड़ी जातियों को 60 प्रतिशत को विशेष अवसर मिले। और दो मकानों से ज्यादा मकानी मिल्कियत का राष्ट्रीयकरण, जमीन का असरदार बंटवारा और उसके दामों पर नियंत्रण होना चाहिए।

 

 

जय प्रकाश नारायण और लोहिया के बीच संबंध
स्वतंत्र भारत की राजनीति और चिंतनधारा पर जिन गिने-चुने लोगों के व्यक्तित्व का गहरा असर हुआ है, उनमें डॉ। राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण प्रमुख रहे हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के आखिरी दौर में दोनों की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण रही है।
अगर जयप्रकाश नारायण ने देश की राजनीति को स्वतंत्रता के बाद बदला तो वहीं राम मनोहर लोहिया ने देश की राजनीति में भावी बदलाव की बयार आजादी से पहले ही ला दी थी। दोनों के व्यक्तित्व बेशक अलग थे लेकिन उनका उद्देश्य लोकतंत्र और समानता का भाव ही था।
लोहिया और जेपी दोनों पर महात्मा गांधी का प्रभाव था | लोहिया का व्यक्तित्व लुभावना होते हुये भी प्रखरता थी, उनके शब्द तीखे होते थे। भावना का वे ख्याल नहीं रखते थे। जबकि जेपी का स्वभाव सौम्य था और उनके व्यक्तित्व में मिठास थी | लोहिया की सप्तक्रांति और जयप्रकाश की संपूर्ण क्रांति में अंतिम उद्देश्यों को लेकर में ज्यादा अंतर नहीं था…Next

 

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