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भारतीयों की सैलेरी के लिए ब्रिटिश संसद में सबसे पहले आवाज उठाने वाला व्यक्ति, ‘द ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से हुआ मशहूर

Pratima Jaiswal

4 Sep, 2018

‘जनता जब आर्थिक न्याय की मांग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह खतरनाक हो जाती है’। हिन्दी के व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने राजनीतिज्ञ व्यवस्था पर सालों पहले ऐसी बात लिखी थी, जो आज भी उतनी ही सही बैठती है।  इसी तरह आर्थिक न्याय को लेकर अक्सर बहस देखने को मिलती है। मजदूर, फैक्ट्री कर्मचारी, मल्टी नेशनल कंपनी के कर्मचारी ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जो अपनी सैलेरी को लेकर हमेशा चिंताग्रस्त रहते हैं। सैलेरी एक ऐसी चीज है, जिस पर कोई संतुष्ट नहीं हो पाया है। यह तो बात हुई आज के वक्त की, लेकिन आजादी से पहले के हालात की बात करें, तो ब्रिटिश हुकुमत के अधीन काम करने वाले ज्यादातर कर्मचारियों को अपने वेतन से जुड़े भेदभाव का अंदाजा तक नहीं था। ऐसे में ‘द ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से मशहूर दादाभाई नौरोजी ने इस भेदभाव के विरूद्ध पहली बार ब्रिटिश संसद में आवाज उठाई थी।

 

 

‘द ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ दादाभाई नौरोजी
ब्रिटिश संसद के सदस्य के रूप में चुने गए थे। अपनी वाकपटुता से सभी को मंत्रमुग्ध करने वाले स्वतंत्रता सेनानी, बुद्धिजीवी, शिक्षाशास्त्री और व्यापारी दादाभाई नौरोजी कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में एक थे। वे कांग्रेस के तीन बार अध्यक्ष चुने गए। वे ‘द ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ’ इंडिया के नाम से मशहूर हुए और ब्रिटिश संसद में पहले भारतीय थे। अहिंसा में विश्वास रखने वाले दादाभाई का मानना था कि सरकार को पशुबल पर नहीं, नैतिक बल पर आधारित होना चाहिए।

 

 

विदेशी जमीन पर देसी गीत गाने वाले नौरोजी

दादाभाई जब ब्रिटिश संसद में सदस्य बने तो उन्होंने भारत की लूट के संबंध में ‘ड्रेन थ्योरी’ पेश की। इस सिद्धांत में उन्होंने भारत से लूटे गए धन को ब्रिटेन ले जाने का उल्लेख किया था। वे ऐसे व्यक्तित्व थे जो विदेशी जमीन पर भी देसी गीत गा रहे थे। उन्होंने ब्रिटिश संसद के सामने भी भारत के प्रति अन्यायों को समाप्त करने की वकालत की। उन्होंने यह भी कहा कि अगर भारत की नैतिक और भौतिक रूप से अवनति होती रही, तो भारतीयों को ब्रिटिश वस्तुओं का ही नहीं, ब्रिटिश शासन का भी बहिष्कार करना पड़ेगा। उन्होंने भारतीयों की राजनीतिक दासता और दयनीय स्थिति की ओर लोगों का ध्यान दिलाने के लिए ‘पावर्टी एंड  अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ पुस्तक लिखी। उन्होंने ब्रिटिश संसद में भारतीयों को दिए जाने वाले असमान वेतन के बारे में भी आवाज बुलंद की।

‘पावर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ के मुताबिक आर्थिक रूप से कमजोर बनाकर भारत को ब्रिटिश राज्य ने अपने अधीन कर लिया। उनके विचार इतने प्रभावशाली थे, कि महात्मा गांधी, गोपालकृष्ण गोखले, लोकमान्य तिलक जैसे कई नेता उनसे जुड़े।

30 जून 1917 को दादाभाई दुनिया को अलविदा कह गए…Next

 

 

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