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अरविंद केजरीवाल, हर्षवर्धन या शीला दीक्षित?

4 दिसंबर को दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के लिए चुनाव होने हैं. इसके साथ ही दिल्ली की गलियों में डंके की आवाज तेज होती जा रही है. उम्मीदवार घर-घर जाकर वोट मांगने से भी गुरेज नहीं कर रहे. हर पार्टी अपना ही राग अलापती नजर आ रही है. ऐसे में विरोधी और दूसरी पार्टी और उनके नेताओं की जमकर भर्त्सना करना भी आम है. ऐसे में कभी कुछ अजीब से व्यंग्य बाण, विवादास्पाद बयान भी आम बात बन गए हैं. अभी हाल ही में सिक्ख दंगों के आरोपी जगदीश टाइटलर ने नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर मोदी में हिम्मत है तो दिल्ली विधानसभा से उनके खिलाफ चुनाव जीतकर दिखाएं और अगर मोदी जीत गए तो वे फांसी चढ़ जाएंगे. ऐसा ऊटपटांग बयान लेकिन यह भी इसी चुनाव प्रचार का एक अंग बन रहा है. यह अकेला नहीं, ऐसे कई अन्य उदाहरण भी हैं. लेकिन यह सब चुनाव की वेदी को अपनी सीमा में लाने के लिए आज आम बात हो गई है.


ऐसा लग रहा हैं दिल्ली कुरुक्षेत्र का मैदान बन गई हो और हर योद्धा अपनी ही जीत के सपने देख रहा हो. प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, रेडियो या आम लोग हों, हर माध्यम प्रचार का माध्यम बना है और हर पार्टी अपने मुद्दों से लोगों को अपने विश्वास में लेने की पुरजोर कोशिश में लगी हैं. एक तरफ भाजपा कांग्रेस सरकार की गलतियों का ढोल पीटती है तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी (आप) बिजली, पानी, शिक्षा जैसे मुद्दों पर लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस पार्टी न केवल अपने पुराने कार्यों का बखान कर अपने लिए चुनावी जमीन तलाशने की कोशिश में है बल्कि नए आधुनिक दिल्ली के भी सपने दिखा रही है.


15 साल की निर्विरोध जीत के बाद इस बार शीला दीक्षित एक कठिन प्रतियोगिता का सामना कर रही हैं. इनके इतिहास में झांके तो शीला दीक्षित का राजनीतिक कॅरियर शानदार रहा है. 1998 में शीला दीक्षित 51 सीटों पर जीत के साथ पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं और उस साल भाजपा को बुरी तरह हार का सामना भी करना पड़ा था. तब से 15 सालों तक इस आयरन लेडी के राजनीतिक कॅरियर में कोई ऐसा पल नहीं आया जिसमें इन्हें पीछे मुड़कर देखना पड़े. दिल्ली में मेट्रो आई, हाईवे बने, मॉल बने और इस चकाचौंध ने न केवल लोगों को विवश किया कांग्रेस को वोट देने के लिए बल्कि शीला दीक्षित के राजनीतिक कॅरियर को भी रौशन किया. पर इस निश्चिंतता को इधर दो-तीन सालों में कॉमन वेल्थ गेम घोटाला, दिल्ली में गैंग रेप की बढ़ती घटनाओं, प्रदर्शनी के दौरान लाठीचार्ज जैसे  कुछ हादसों ने न केवल नए चेहरों को उभरने का मौका दिया है बल्कि 15 साल की इस जीत पर ग्रहण लगने का संशय भी पैदा किया है.

साम, दाम, दंड, भेद की राजनीति


इस बार दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के लिए खड़े उम्मीदवारों में सबके अपने फसाने हैं. अगर भाजपा प्रत्याशी डॉ. हर्षवर्धन की बात की जाए तो ये कभी भी बड़ा राजनीतिक चेहरा नहीं रहे. उनकी तुलना में विजय गोयल की छवि ज्यादा जानी-पहचानी है. यही वजह रही कि उन्हें दिल्ली में चुनाव प्रत्याशी के रूप में खड़ा करना भाजपा के लिए विवाद का मुद्दा बन गया. पार्टी के अंदर डॉक्टर साहब के रूप में जाने जानेवाले डॉ. हर्षवर्धन की छवि विनम्र, स्वच्छ और मजबूत मानी जाती है. स्वास्थ्य मंत्री के रूप में तंबाकू, पोलियो और कई स्वास्थ्य अभियानों में उनकी भूमिका सराहनीय रही है. जब आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी अरविंद केजरीवाल एक साफ सुथरी छवि के दावे के साथ चुनाव में खड़े हुए तो भाजपा के लिए भी यह आवश्यक हो गया की वे डॉ. हर्षवर्धन जैसे ईमानदार छवि वाले प्रत्याशी को खड़ा करे. इस तरह दिल्ली के लिए अगर प्रत्याशियों की बात की जाए तो मुकाबला टक्कर का हो सकता है.


इसके साथ इस बार दिल्ली चुनाव में अगर कुछ अनोखा है तो वह है ‘आप’ पार्टी का उद्भव. अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में ‘आप’ ने न केवल राजनीतिक मैदान में अपना आगाज किया है बल्कि विधानसभा की 70 सीटो में 47 सीटों पर जीत का दावा भी कर रही है. भ्रष्टाचार, घोटाला और अपराध से त्रस्त दिल्ली की जनता ने ‘आप’ का खुलकर अभवादन करती भी दीख रही है. ‘आप’ पार्टी का चुनाव चिह्न ‘झाड़ू’ लोगों को विश्वास दिल रहा है की अगर यह सरकार आई तो इस राज्य से हर तरह का कचरा साफ कर देगी. आप ने कई दावे किए हैं जैसे बिजली की कीमत आधी करना, स्कूलों में डोनेशन बंद करवाना, पानी की स्वच्छता, रिलायंस जैसे निजी प्रदाता कंपनियों द्वारा अपनी सेवा के लिए किराया कम करवाना आदि. अरविंद केजरीवाल की सीधी-सादी छवि भी लोगो को भा रही है और मतदाता अविश्वसनीय तरीके से इस पार्टी से जुड़ रहे हैं. आप पार्टी ने गरीब तबके के लोगों को न केवल प्रभवित किया है बल्कि पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग को भी अपने विश्वास लेती दीख पड़ती है.


इस तरह एक नजर देखें तो इस बार दिल्ली के चुनाव मैदान में सभी राजनितिक दलों ने अपने-अपने अर्जुन को युद्धभूमि में उतारा है. रणभूमि में बिगुल फूंका जा चुका है और हर किसी की जीत की अटकले भी लगाई जा रही हैं. लेकिन इस बार के चुनाव में किसी भी प्रकार का अनुमान लगाना वाकई में मुश्किल है क्योंकि हर प्रत्याशी अपनी अद्भुत क्षमता के साथ लड़ रहा है. अब इंतजार है 4 दिसंबर का जब जनता अपना फैसला सुनाएगी और 8 दिसंबर का जब फैसला होगा कि किस अर्जुन ने अपना लक्ष्य भेदन किया.

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