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लोकतंत्र के लिए खतरनाक ‘आप’ का चमत्कार – भाग 2

भाग-1 से आगे….

democracy of indiaपारिभाषिक तौर पर देखें तो आम आदमी पार्टी (आप) भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन से छिटका हुआ एक राजनीतिक समूह है. अरविंद केजरीवाल ने इसे अस्तित्व में लाते हुए सत्ता में आकर सत्ता की गंदगी को हटाए जाने का उद्देश्य बताया था. पानी-बिजली जैसे छोटे-छोटे स्थानीय मुद्दों को आधार बनाकर आंदोलित करते हुए ‘आप’ स्थापित राजनीतिज्ञों (कांग्रेस-भाजपा) तक के लिए चुनौती बन गया है. आंदोलन के स्वरूप के साथ आगे बढ़ी इस पार्टी के लिए आंदोलन ही इसकी सफलता का राज भी है. कई लोग कहते हैं कि व्यावहारिक तौर पर ‘आप’ के वादे पूरे नहीं किए जा सकते और इसमें असफल होने पर जनता खुद इसे अगले चुनाव में सत्ता से बाहर कर देगी. हो सकता है यह सही हो लेकिन ‘आप’ का इस तरह उभरना भारतीय जनता की एक कमजोरी और लोकतंत्र पर मंडराता खतरा दर्शाता है.


गौरतलब है कि ‘आप’ का कोई भी सदस्य अन्ना आंदोलन से पहले जनता के बीच कोई विशेष पहचान नहीं रखता था. अन्ना आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना ही उनकी पहचान थी. इसके अलावे आखिर उन्होंने ऐसा क्या उल्लेखनीय किया है? माना कि स्थापित राजनीतिज्ञों से जनता बेहाल है और वह कुछ नया और सुधारात्मक चाहती थी लेकिन क्या सिर्फ सुधारात्मक वादों के आधार पर किसी के भी साथ हो लेना सही है? वादे करने में कोई गुरेज नहीं है, उस पर विश्वास जताना भी कोई गुनाह नहीं है लेकिन उसका कोई आधार तो होना चाहिए! इतिहास गवाह है कि दो बिल्लियों के झगड़े का लाभ हमेशा बंदर लेता रहा है. आप का उभरना भी राजनीति में बिल्लियों (परंपरागत राजनीति से ऊब चुकी ‘जनता’ और स्थापित राजनीतिज्ञों और राजनीतिक पार्टियों) के झगड़े में बंदर (आप) को लाभ मिलने जैसा ही कुछ है. कांग्रेस और भाजपा के खाली दावों और भ्रष्टाचार से ऊब चुकी जनता ने नए विकल्प ‘आप’ को चुनने का फैसला दिया. पहले ही चुनाव में, वह भी इतने अल्प वक्त में दिल्ली विधानसभा में 72 में से 28 सीटें ले जाना और जीत के कगार पर 32 सीटों पर भाजपा को सिमटा देना कुछ ऐसी ही कहानी कहता है. इसके पीछे जो कारण रहा वह है ‘आंदोलन’! आज भले ही यह बड़े बदलाव का कारक लग रहा हो लेकिन भविष्य में यह बाहरी अवांछित तत्वों के लिए भारतीय लोकतंत्र को अस्थिर करने का एक जरिया बन सकता है.


दिल्ली की जनता का आम आदमी पार्टी पर विश्वास दिखाने का एकमात्र कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन और इसके आंदोलित बोल रहे. इसमें कोई दो राय नहीं आज व्यवस्था में कई बड़ी खामियां हैं. पर सवाल यह उठता है कि क्या अपनी इस खामी का फायदा किसी और को दिया जा सकता है? खामियां हों तो उसे थोड़ा वक्त लगाकर दुरुस्त किया जा सकता है लेकिन अगर व्यवस्था ही अपने हाथ में न रही तो दुरुस्तगी का तो कोई सवाल ही नहीं आता. आंदोलनों के नाम पर एक बड़ी भीड़ का किसी भी चेहरे के साथ हो लेना लोकतंत्र को खतरा पैदा कर सकता है. हो सकता है कल को कोई बाहरी तत्व भारतीय लोकतंत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए ऐसे आंदोलनों के स्वरूप का फायदा उठाए. जयचंद और पृथ्वीराज चौहान के बीच के मनमुटाव का फायदा तुर्क ले गए. हो सकता है कल किसी स्थानीय या राष्ट्रीय मुद्दे को यहीं के किसी चेहरे की आड़ में उठाकर कोई विदेशी ताकत अस्तित्व में आना चाहे. जनता तो हमेशा की तरह उसके साथ हो लेगी लेकिन वास्तव में वह अपनी सत्ता किसी और के हाथ दे रही होगी. इस तरह शायद भारतीय लोकतंत्र एक और उपनिवेशवाद के चंगुल में आ जाए जो भारतीय लोकंत्र के भविष्य के लिए कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता.

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अगर अभी ‘आप’ को 2, 4, 8 और 10 सीटें मिलतीं और भविष्य में भाजपा की तरह यह भी राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में अपनी मजबूत दावेदारी के साथ उभरती तो यह हमारे स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र का परिचायक होता. पर अचानक उभरकर, अचानक इसके केंद्र में आने का अर्थ है कि एक बार फिर आम जनता को स्वस्थ जनतंत्र का आशय समझने की जरूरत है. हमारी परेशानी यह है कि हम चमत्कारों में यकीन करते हैं. हकीकत की परेशानियों को चुटकी में हल करना चाहते हैं. इससे भी बड़ी बात यह कि हम खुद पर यकीन नहीं करते, किसी नेतृत्व का इंतजार करते हैं. नेतृत्व के नाम पर हम किसी के भी पीछे हो लेते हैं. लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा में यह शामिल नहीं है. लोकतंत्र परिपक्वता की मांग करता है, विश्वसनीयता की जरूरत बताता है और इसके लिए विश्वसनीयता को साबित किए बिना सिर्फ एक आंदोलन के आधार पर किसी को नेतृत्व का अधिकार देकर विश्वसनीय नेतृत्व को हटा देना कहीं से सही नहीं कहा जा सकता. भारतीय जनता को एक बार फिर इस पर विचार करने की जरूरत है. जरूरत है कि किसी पर विश्वास दिखाने से पहले उसे वक्त के साथ विश्वास की आंच में पकाया जाए.

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