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राम के भरोसे लगाएंगे नैय्या पार

2014 elections indiaएक तरफ कांग्रेस है कि अगले चुनाव में जीत के दावे पेश कर रही है. दूसरी तरफ भाजपा है जो मोदी नाम की माला के बाद वापस ‘राम-नाम’ का जप करने की तैयारी में है. वस्तुत: यह 2014 के लोकसभा चुनाव का बिगुल है.


विश्व हिंदू परिषद (विहिप) अपनी 84 कोसी यात्रा के लिए उत्तर प्रदेश सरकार और हाइकोर्ट के फैसले, दोनों को चुनौती देने को आमादा है. विवादित राम मंदिर निर्माण के लिए आयोजित की जा रही इस यात्रा के लिए विहिप के हठ का यथार्थ तो सबको पता है. आम चुनाव 2014 की संसद तक की यात्रा के लिए गर्म राजनीति में कई लोहे पिघलाए गए हैं और कई आगे भी पिघलाए जाएंगे. सत्तापक्ष-विपक्ष की नीतियां-रणनीतियां, एक दूसरे पर छींटाकशी-कटाक्ष का सिलसिला तो अनवरत और हर राजनीति का हिस्सा रही है. पर 2014 का लोकसभा चुनाव बहुत मायनों में खास है.


एक लंबे अंतराल के बाद 2004 में जब कांग्रेस ने गठबंधन सरकार के माध्यम से सत्ता में वापसी की तो यह लहर लाजिमी दिख रही थी. देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस और भाजपा हमेशा आमने-सामने रहीं. कांग्रेस का राजनीतिक इतिहास और नेहरू-गांधी खानदान का नाम हमेशा इसकी सबसे मजबूत दावेदारी पेश करती रही. लेकिन नरसिम्हा राव की सरकार के बाद इसकी नई भ्रष्टाचारी छवि ने कांग्रेस के सत्ता की नींव हिला दी. इसके बाद ही काफी समय तक कांग्रेस और भाजपा के बीच यह सत्ता डोलती रही. इस बीच एक-दो छौंक कुछ छोटे, क्षेत्रीय पार्टियों ने भी लगा ली. लेकिन कांग्रेस पहले की सी मुकाम नहीं पा सकी. इसकी एक बड़ी वजह भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे चेहरे का होना भी रहा.


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जनता के बीच अपनी साफ छवि से लोकप्रियता हासिल कर चुके अटल बिहारी की खासियत रही कि वे हिंदुस्तान के लगभग हर वर्ग की पसंद बन चुके थे. अटल बिहारी जहां अपने लीडरशिप में भाजपा की सत्ता की दावेदारी मजबूत करते रहे, कांग्रेस राजीव गांधी के बाद मुश्किल से नरसिम्हा राव को लाकर, उसे वापस खोकर फिर एक लोकप्रिय चेहरे की कमी से मन मसोसती रही. हालांकि अटल बिहारी की लोकप्रियता भी भाजपा को लगातार, लंबे समय तक एक स्थिर सरकार देने में सक्षम नहीं बना सकी. अटल बिहारी सरकार 13 दिनों में भी गिरी और 13 महीनों में भी. लोकसभा कार्यकाल पूरा किए बिना बार-बार सरकार गिरना और बार-बार आम चुनावों ने भाजपा को मजबूत और स्थिर सरकार देने में हमेशा शंकित दृष्टि से दिखलाया. हालांकि बार-बार अटल बिहारी का चुना जाना भी उनकी मजबूत दावेदारी पेश करती रही.


भाजपा की उस विजय दावेदारी में अटल बिहारी के अलावे अन्य दिग्गज नेताओं की भूमिका से भी इनकार नहीं कर सकते. प्रमोद महाजन, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह आदि दिग्गज नेताओं के साथ भाजपा उस वक्त कांग्रेस से हमेशा एक कदम आगे दिखी, जबकि कांग्रेस अपनी ही पार्टी में अंदरूनी कलह और विलगाव को सुलझाने में उलझी नजर आई. पार्टी में सशक्त नेता तो दूर, ऐसा लग रहा था अब कांग्रेस का विघटन तय है और कांग्रेस एक इतिहास बनकर रह जाएगी. लेकिन उसी वक्त सोनिया गांधी कांग्रेस की डूबती नैय्या की खेवनहार बनकर आईं.


2004 के आम चुनावों में नेहरू-गांधी परिवार के प्रति आम जनता का विश्वास फिर नजर आया. सोनिया गांधी कांग्रेस की कमान संभालने के साथ ही कांग्रेस के कद्दावर नेताओं को वापस लाने की मुहिम में जुट गईं और किया भी. सोनिया ने टूटी हुई कांग्रेस को एक कर कांग्रेस का आत्मविश्वास लौटाया तो जनता ने उन पर विश्वास दिखाकर कांग्रेस को जीत दिलाई. अटल बिहारी की लोकप्रियता तब भी थी पर उनके कार्यकाल में गुजरात के गोधरा दंगों ने पार्टी की छवि से उनकी छवि को दबा दिया. भाजपा ने फिर भी सत्ता की आस नहीं छोड़ी. सोनिया गांधी की विदेशी छवि को उछालकर नए पैदा हुए कांग्रेस के आत्मविश्वास को वापस तोड़कर भाजपा ने अपनी विजय नीति बनाने की कोशिश की. लेकिन उससे एक कदम आगे बढ़कर सोनिया ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर राजनीति की गर्म भट्ठी में त्याग का लोहा पीटकर सत्ता का हथियार बना ही लिया. एक तरफ तरफ लोगों ने सोनिया को त्याग की मूर्ति माना, दूसरी तरफ अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह पर उनका विश्वास था. भाजपा की राजनीति उल्टी पड़ गई. ‘विदेशी प्रधानमंत्री’ की भट्ठी की आंच भाजपा पर ही पड़ गई. आंच भी ऐसी-वैसी नहीं, इस आंच  में भाजपा ऐसी जली कि 2009 के लोकसभा चुनाव में सोनिया और मनमोहन ही ‘दिल्ली का मैदान’ मार गए.


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2014 elections indiaपर दूसरे कार्यकाल में सोनिया और मनमोहन दोनों के दम फूले नजर आने लगे. एक के बाद एक भ्रष्टाचार के मामलों में फंसी यूपीए सरकार में यहां तक कि छींटे दागरहित माननीय प्रधानमंत्री तक भी पहुंच गए. बस मौके की तलाश में बैठी भाजपा को जैसे अंधेरे में रौशनी की एक किरण नजर आई. और बस शुरू हो गई 2014 चुनाव के लिए नए जोश-खरोश के साथ भाजपा का बिगुल बजाने की तैयारियां.


भ्रष्टाचार में हर तरफ से घिरी कांग्रेस के इस दाग को अपनी जीत के लिए एक मजबूत आधार मान रही भाजपा को बड़ा झटका कर्नाटक चुनाव में लगा. गर्मागर्म भ्रष्टाचार आरोपों के बावजूद कर्नाटक में कांग्रेस की जीत भाजपा की बुरी तरह हार ने इसके नए-नए जोश को जैसे बिजली का झटका दे दिया. अगले लोकसभा चुनाव में दिल्ली जीतने का सपना देख रही भाजपा के लिए यह सपना टूटने का इशारा के समान था. और फिर शुरू हो ही बौखलाहट भरी छटपटाहट। मोदी का दामन थामकर तमाम विवादों के बावजूद भाजपा ने मोदी की माला का संकल्प ले ही लिया. पर अपनी ही पार्टी में उठे विरोध के स्वर ने उसे फिर आहत किया.


2014 के चुनाव में दिल्ली किसके हाथ में होगी यह तो वक्त ही बताएगा. कांग्रेस की जीत के दावों के साथ बीजेपी भी अपनी रणनीति में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती. मोदी को युवा विकासपरक नेता के रूप में पेश करने की इसकी कोशिशें आज भी जारी हैं. लेकिन कर्नाटक चुनाव में मोदी का जादू बेअसर पाकर कहीं न कहीं यह शंकित भी है. शायद इसीलिए अब वापस एक पुराना ‘राम-मंदिर’ का मुद्दा उठाने की कोशिश में है.


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विहिप और भाजपा की रिश्तेदारी किसी से छुपी नहीं है. विहिप की यह ’84 कोसी परिक्रमा यात्रा’ के पीछे वापस ‘राम मंदिर’ के नाम पर शार्मिक भावनाओं को उफानकर वोट बनाने की तैयारी भी जगजाहिर है. आश्चर्य की बात यह है कि भाजपा इसे चुनावी बिगुल के रूप में आजमा रही है. जहां कांग्रेस तमाम भ्रष्टाचारी आरोपों के बावजूद जनता के लिए अपनी नेकनीयती दिखाने की कोशिश में है. खाद्य सुरक्षा बिल और भूमि अधिग्रहण कानून इसके अंतिम हथियार हैं. और हास्यास्पद रूप से भाजपा मोदी-मुहिम और राम-मंदिर का मुद्दा उठा रही है.


बहरहाल फैसला हरहाल में जनता-जनार्दन का ही होगा. 84 कोसी परिक्रमा यात्रा से बीजेपी और विहिप जनता का क्या कल्याण करना चाहते हैं यह तो वे ही जानें लेकिन उन्हें इतना जरूर जानना चाहिए कि आज की जनता बेवकूफ नहीं है. कांग्रेस क्या कर रही है जनता को यह भी पता है लेकिन बीजेपी क्या कर सकती है जनता यह भी समझ सकती है. बीजेपी और कांग्रेस देश की दो बड़ी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी जरूर हैं लेकिन जनता के पास चुनाव की कमी भी नहीं है. अगर आजमाना ही है तो किसी नए को ही मौका देकर क्यों न आजमाया जाए! कहीं ऐसा न हो कि बिल्लियां लड़ती रह जाएं और छींका कोई और ले उड़े!


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