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भूमंडलीकरण की अनुदार प्रवृत्तियां

भूमंडलीकरण की बढ़ती चुनौतियों के मद्देनजर विश्व के सभी देशों के समक्ष कुछ ऐसे प्रश्न उत्पन्न हो चुके हैं जिनका समाधान निकाल पाने में सभी राष्ट्र अभी तक असफल ही साबित हुए हैं. समेकित रूप से इन चुनौतियों के बारे में सजग दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है ताकि समय रहते हल सुनिश्चित किया जा सके. यदि देखा जाए तो भूमंडलीकरण की बयार ने शासन-प्रशासन से लेकर व्यवसाय-समाज और संस्कृति तक सभी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है जिससे मुक्त होने की छटपटाहट भी जारी हो चुकी है.

 

भूमंडलीकरण का ज्वार मूल रूप से आर्थिक जरूरतों की उपज है. पूंजीवादी व्यवस्था की सबसे बड़ी चिंता नए बाजारों की खोज और अपने उत्पादों को खपाने की होती है. इसके अलावा विकसित देशों की सबसे जरूरी फितरत अपनी संस्कृति और भाषा का प्रभुत्व भी स्थापित करना होता है.

 

पूर्व औपनिवेशिक व्यवस्था के पतन के पश्चात जब यह जाहिर हो गया कि अब एशियायी व अफ्रीकी देशों पर पहले की तरह शासन कायम कर उनके संसाधनों का दोहन नहीं किया जा सकता तब किसी नई व्यवस्था की खोज जरूरी हो चुकी थी. ऐसे में सभी विकसित देशों के सामने यक्ष प्रश्न यही था कि नव स्वतंत्र देशों को अपने प्रभाव में रखने के लिए कौन सा तरीका अपनाया जाए?

 

फलतः समाधान के रूप में उन्हें ग्लोबलाइजेशन का कॉंसेप्ट दिखा जिसके बल पर वे विकासशील और अल्पविकसित देशों को सब्जबाग दिखा कर अपने लपेटे में ले सकते थे. विकासशील और अल्प विकसित देशों ने पूंजीवादी देशों के मूल मंतव्यों को समझे बिना ही उनके सुझाए रास्ते को अनुकरणीय समझ लिया. बस यहीं भूल हो गयी.

 

भारत और चीन जैसे देश भी इस चक्रव्यूह से बच सकने में नाकाम सिद्ध हुए. सोवियत रूस के पतन ने तथाकथित रूप से तीसरी दुनिया के देश कहे जाने वाली शक्तियों के सामने एक लाचारगी पैदा कर दी. इन देशों को सही रास्ते की तलाश थी जिस पर चल कर वे अपनी बदहाल अर्थव्यवस्था को बचा सकते थे. ऐसी विकल्पहीनता की स्थिति में उनके पास समृद्ध देशों के दिशानिर्देशों के अनुसार चलना एक मजबूरी बन चुकी थी. और यही मजबूरी भूमंडलीकरण के लिए एक सुविधाजनक मार्ग बन गया.

 

इस ग्लोबलाइजेशन को सहारा मिला उदारीकरण और निजीकरण के सिद्धांतों से जिनका उदय ही इस आधार पर हुआ था कि वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को एकीकृत कर उनके संसाधनों का दोहन सही ढंग से किया जा सकता है. इन सिद्धांतों को समग्र रूप से देखने की जरूरत है ताकि इनके छिपे हुए निहितार्थों को समझा जा सके. वास्तविक रूप से यह तीनों व्यवस्थाएं परस्पर आश्रित हैं. यदि पूरी धरती को वैश्वीकृत होना है तो सारी दुनियां के देशों को उदारीकरण और निजीकरण के रास्ते पर चलना एक विवशता बन जाती है. लेकिन इस मजबूरी के कारण अधिकांश देशों के सामने धनी देशों के फैलाए मकड़जाल में उलझने के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं बचता. परिणामतः आज इस कुचक्र से बच निकलने के सारे रास्ते एक प्रकार से बन्द ही हो चुके हैं.

 

तलाशनी होगी सही दिशा

 

लेकिन हालात से समझौता करने की बजाय उस दिशा में सोचने की जरूरत है जिससे भूमंडलीकरण की अनुदार प्रवृत्तियों से बचा रह कर उसके लाभ को हासिल किया जा सके. हालांकि कोई भी रास्ता एकतरफा नहीं होता और यही बात ग्लोबलाइजेशन के विषय में भी सत्य है. यानी यदि हमने भूमंडलीकरण से लाभ उठाने की सोची है तो हमें इसके नकारात्मक प्रभावों को भी झेलने के लिए तैयार रहना होगा. अब बात आती है कि कैसे इन नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है?

 

इसके लिए सबसे जरूरी है कि विकासशील और अल्पविकसित देशों के बीच साझा मुद्दों पर समान सहमति कायम किया जाए. विकसित देशों की एकतरफा नीतियों को समवेत स्वर में बहिष्कृत कर उन्हें विकासशील और अल्पविकसित देशों की आवश्यकताओं और अलग-अलग संस्कृति के प्रति संवेदनशील बनाया जाए. विश्व व्यापार संगठन, संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसियों तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को विकासशील राष्ट्रों के हितों पर विचार करने पर मजबूर किया जा सके इसके लिए एक सुदृढ़ नीति बना कर दबाव डालना होगा. वैश्विक मसलों का हल वैश्विक रूप से ही संभव है इसलिए जरूरत इस बात की है कि सभी ऐसे राष्ट्र जो मुख्य धारा में बने रहना चाहते हैं उन्हें मिलजुल कर प्रयास करना ही होगा.

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