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दास्ताँ है यें जीव की

DIL KI KALAM SE

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दास्ताँ है यें जीव की
वस्त्र ढ़के, मृत शरीर की
वृद्ध होते ही छोड़ चलें
नींव लिखने, नई तकदीर की

प्रीत जाती जब, हृदय जग
दो तनो कर, एक मन
बीज से जाता पराग बन
भू धरा पर ले जन्म
पंचतत्वो का कर संगम
पाया जग में मानव तन

शिशु से किशोर तक
रूप बनाया मन भावन
अटखेलियाँ कर कर के
हर्षित करता सबका मन
शिक्षा का वो कर अध्ययन
ज्ञान से करता जग रोशन

अध्यन का समय हुआ ख़त्म
युवा अवस्था में बढ़ा कदम
घर परिवार के सारे अक्ष
उसके आते अब समक्ष
कमाने का अब स्रोत बना
गृहस्त जीवन में बढ़ा कदम

धर्म बेटी बेटे का निर्वाह कर
मात पिता की सेवा कर
कर्तव्य के अपने पालन में
चित को अपने नियंत्रित कर
कर्म धर्म का मूल्यांकन कर
वानप्रस्त में प्रस्थान कर
इस तन को फिर जाता छोड़
प्राणों को अपने त्याग कर

यात्रा है ये जीव की
वस्त्र ढ़के, शरीर की
कालचक्र का चक्रा घूमे
नींव रखने फिर एक
नई तकदीर की

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