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जिन्दगी का सच

DIL KI KALAM SE

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विरह की बेला चुप सी आती
कर्मभूमि और गृहस्ती में
होले होले कदम बढाती
सुख समृधि को, मिटा
अंतर्मन में भेद करा
मन की शांति, भंग कर जाती
काल चक्र सा एक रचा
रह रह कर
भ्रम जाल में हमें फंसाती
ढंग बेढंग के करतब करा
इन्सान से हमको,
पशु बनाती
वक़्त की नजाकत को समझ
नट बना, इंसान नचाती
ऐसा अपना रंग दिखाती
जब तक समझ में
आता कुछ भी
तब तक सब कुछ
धुल में सब कुछ ये मिलाती
पल भर में ये नेत्र भिगो
हमारे अस्तिव का बोध कराती
लहर बन दिल के
तटबंधों से ये टकराती
सुदृढ सुकोमल हृदय
को नीरसता से भर जाती
माधुर्यहीन कर जग की
सौन्दर्यता को
जीते जी ही नरक बनाती
अभिज्ञान का जो
करें प्रयास तब तक
जिंदगी पूरी हो जाती
ऐसा हृदय में दर्द जगाती
क्षण भर में ही विरह
से जिंदगी तबाह हो जाती

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