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यह कैसा दौर है ?

Parmatma Ke Pankh

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आ गया वक्त का ये कैसा दौर है,
चारों तरफ मचा ये कैसा शोर है,
कोई पगडंडी नाप रहा है,
कोई भीतर अपने झांक रहा है,
निहार रहा कोई आकाश की ओर,
कैसे फैले कोरोना के बादल, चारों ओर,
निश्चित ही कोई कहानी है,
ना तुम जानो, ना मैंने जानी है,
पगडंडियों पर चलकर मैं कहां जा रहा,
घर पहुंचने को मैं छटपटा रहा,

 

 

 

पेट की भूख मुझे शहर ले आई थी,
तब भी क्षुधा जीवन की शांत न हो पायी थी,
शांत करते-करते मैं अपनी क्षुधा को,
इतना मस्त मै हो गया,
भूल गया था अपनों को,
और अपनों से जुदा हो गया।

 

 

 

आज कदमों को बिन सोचे,बढ़ाने को मजबूर हूं,
अकेला अपनों के बिन जी तो सकता था,
पर मरना नहीं चाहता, अपनो से मिले बिन,
पहुंचकर!
अपनों से मिलने की क्षुधा तो शांत हो गई,
मगर देखो यारो, मेरी किस्मत,
मैं जिन अपनों की खातिर यहां से दौड़ा था,
आज फिर उनकी भूख की खातिर,
उल्टे पांव दौड़ पड़ा,
ये जीवन के क्षण बड़े कीमती है
ना जाने क्यों हम अपनों से ही,
छोटी-छोटी बातों पर रूठ जाते है,

 

 

 

जीना बड़ा मुश्किल होता है,अपनों के बिन,
यही ये दौर हमें समझाने आया है,
कुछ नहीं रखा है जीवन में,
यह नश्वर है क्षणभंगुर है,
जी लो अपनी हर सांसों को
अपनों से प्रेम से बोलो,
ना उनकी बातों को तोलो,
बस अपनी जीवा में मीठा रस घोलो रस घोलो।
परमात्मा के पंख

 

 

 

डिस्कलेमर : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी है। जागरण जंक्शन किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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