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‘मैं’ से निकल मानव बन

paramjit Kaur

paramjit Kaur

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हम सबमें कहीं सशक्त है ‘मैं’,
कहीं छिपी है, तो कहीं विकराल है।
मूल्यों और भावनाओं को तोड़ती,
असंतुष्ट, स्वार्थी और संवेदनहीन बनाती ‘मैं ‘
रिश्तों में फैलती, संक्रमण की तरह ,
अहसासों को लगती दीमक की तरह ,
‘मैं ‘ में अंधा, मर्यादाओं को लाँघ रहा है।
खोकर इसमें वहशी भी हो रहा है।
क्या ये विकृति ही तेरी जागीर है ?
जो नई पीढ़ी भी अपना रही है।
इसके मद में अपरिपक्व हो ,
भँवर में फंसती जा रही है।
सोचो ,
क्या, हममें शक्ति होती ?
यदि सूर्य में होती ‘मैं’ !
होता, हमारा अस्तित्व ?
यदि प्रकृति में होती ‘मैं’ !
अपनी विकृत सोच, भविष्य को देकर,
उसे धूमिल मत कर !
कर्ज़दार हैं हम, इस धरती के ,
‘मैं’ से निकल मानव बन……!

परमजीत कौर

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