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ओशो का अमेरिका प्रवास क्‍यों विवादों में रहा, मौत के बाद आश्रम पर हक की लड़ाई

Rizwan Noor Khan

19 Jan, 2020

रजनीश ओशो को दुनियाभर में शांति विचारक के तौर पर जाना जाता है। वह लेक्‍चरर से सन्‍यासी और फिर विचारक के रूप में प्रसिद्ध हुए। जब वह 4 साल के लिए अमेरिका में रहे तो वहां उनकी लग्‍जरी लाइफ को लेकर खूब सवाल किए गए। 19 जनवरी को ओशो की पुण्‍यतिथि है इस मौके जानते हैं उनके जीवन के कुछ महत्‍वपूर्ण हिस्‍सों के बारे में।

 

 

 

 

 

 

चंद्रमोहन बना रजनीश
मध्‍यप्रदेश के कुपवाड़ा जिले में एक सामान्‍य परिवार में 11 दिसंबर 1931 को जन्‍मे चंद्रमोहन जैन आगे चलकर रजनीश ओशो कहलाए। बचपन से ही विश्‍व इतिहास और दर्शन में खास रुच‍ि लेने वाले चंद्रमोहन ने जबलपुर विश्‍वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की और बाद में यहीं पर लेक्‍चरर हो गए। काफी समय तक यहां पढ़ाने के दौरान उनके अंदर विश्‍व दर्शन और अध्‍यात्‍म के लिए गहरा प्रेम जाग उठा।

 

 

 

 

दर्शन और अध्‍यात्‍म ने जिंदगी बदली
लेक्‍चरर की नौकरी छोड़कर चंद्रमोहन अलग अलग धर्मों के दर्शन के बारे में लोगों को प्रवचन देने लगे। इस दौरान वह रजनीश ओशो के नाम से पुकारे जाने लगे। रजनीश ओशो देश के अलग अलग शहरों में ध्‍यान केंद्र और अध्‍यात्‍म केंद्रों के लिए शिविर का आयोजन करने लगे। यहां आने वाले लोगों को वह जीवन को सही दिशा में ले जाने और उसके सही उद्देश्‍य के प्रति जागरूक करते।

 

 

 

 

 

 

सन्‍यास और प्रसिद्धि
कुछ महीनों बाद ही उन्‍होंने सन्‍यास की घोषणा कर दी। इस दौरान लोग उनसे इतना प्रभावित हुए कि उन्‍हें भगवान रजनीश ओशो कहने लगे। दुनियाभर में ख्‍याति हासिल करने वाले रजनीश ओशो ने अमेरिका में भी भारतीय दर्शन और अध्‍यात्‍म से लोगों को रुबरू कराने के लिए प्रवास का ऐलान किया। 1981 में वह अमेरिका पहुंचे और यहां के ओरेगॉन प्रांत में रहने लगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यहां उन्‍होंने 65 हजार एकड़ जमीन में आश्रम की नींव रखी।

 

 

 

 

 

अमेरिका प्रवास और लग्‍जरी लाइफ
अमेरिका में रहते हुए रजनीश ओशो के पास रॉल्‍स रॉयस जैसी महंगी गाडि़यां, घडि़यां, डिजाइनर कपड़े और आलीशान जिंदगी गुजारने को लेकर बातें सामने आईं। ओशो की ऐसी जिंदगी को लेकर खूब विवाद हुआ। इस दौरान ओशो के अनुयायियों ने अमेरिका के आश्रम को रजनीशपुरम नाम के शहर के तौर रजिस्‍टर्ड कराने का प्रयास किया लेकिन वह अमेरिकी सरकार ने इसे नहीं माना।

 

 

 

 

 

 

रहस्‍मयी मौत और विरासत
रजनीश ओशो 1985 में अमेरिका से भारत लौट आए। यहां करीब 5 साल बाद पुणे के आश्रम में उनकी अचानक मृत्‍यु हो गई। उनकी मौत के बाद पुणे के आश्रम पर मालिकाना हक को लेकर करीबी अनुयायियों में विवाद छिड़ गया। आोशा की मौत का सर्टीफिकेट जारी करने वाले डॉक्‍टर ने मौत के कारणों पर लंबे समय तक चुप्‍पी साधे रखी थी। रजनीश ओशो अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके विचार और प्रवचन किताबों की शक्‍ल में हमारे बीच अभी भी मौजूद हैं।…NEXT

 

 

 

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