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रंग बदलकर बात करने वाला लुप्तप्राय जीव मिला, वनों की अंधाधुंध कटाई से खतरे में आई थी दुर्लभ प्रजाति

अपने शरीर का रंग बदलकर संवाद करने वाले लुप्तप्राय दुर्लभ जीव को कई साल बाद फिर से विचरण करते देखा गया है। 7 साल पहले इसको विलुप्तप्राय जीवों की रेडलिस्ट में शामिल किया गया था। दरअसल, यहां बात हो रही है अफ्रीकी देश मलावी में पाए जाने वाले दुर्लभ बौने गिरगिट (रैम्फोलियन चैपमैनोरम) की। वनों की अंधाधुंध कटान के कारण यह जीव संकट में आया था। गिरगिट की सबसे छोटी प्रजाति का जीव होने की वजह से इसे बौना या छोटा गिरगिट कहा जाता है।

Rizwan Noor Khan
Rizwan Noor Khan 4 Aug, 2021

 

Image courtesy- Krystal Tolley Via/CNN

 

कम लंबाई की वजह से बौना गिरगिट नाम
पशु चिकित्सक और लेखक कॉलिन टिलबरी ने पहली बार साल 1992 में बौने गिरगिट (रैम्फोलियन चैपमैनोरम) का वर्णन किया था। जीव विज्ञानियों ने अध्ययन के बाद इसे गिरगिट की सबसे छोटी प्रजाति वाला दुर्लभ बौना गिरगिट माना था। इसकी लंबाई मात्र 5.5 सेंटीमीटर (2.2 इंच) होती है और यह दक्षिण-पूर्वी अफ्रीकी देश मलावी के वर्षावनों के मूल निवासी हैं।


गिरगिट की सबसे सुंदर प्रजाति
सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार द इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कंजर्वेशन ओरिक्स में प्रकाशित एक अध्ययन में जीव विज्ञानियों ने इसे अन्य गिरगिट की प्रजातियों के मुकाबले बेहद शांत और सुंदर बताया है। यह बाकियों के मुकाबले हिंसक या खतरनाक भी नहीं है। अध्ययन की प्रमुख लेखिका प्रोफेसर क्रिस्टल टॉली ने बताया कि यह बौने गिरगिट ज्यादातर भूरे रंग के होते हैं, लेकिन वे नीले और हरे रंगे में खुद को बदलते रहते हैं।


रंग बदलकर संवाद करने में माहिर

दक्षिण अफ्रीका की विट्स यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर क्रिस्टल टॉली के अनुसार जब यह गिरगिट अपने शरीर पर छोटे चमकीले डॉट्स बनाते हैं तब और भी सुंदर दिखते हैं। वह कहती हैं कि शरीर का रंग बदलकर गिरगिट की यह दुर्लभ प्रजाति एक-दूसरे से संवाद स्थापित करने में सक्षम है। अध्ययन में बताया गया कि इस बौने गिरगिट के विलुप्त होने का जोखिम सरीसृप जीवों के क्रम में बहुत अधिक है।


2014 में माना गया था लुप्तप्राय जीव
वनों की तेज कटान से इस दुर्लभ जीव का अस्तित्व खतरे में आया था। रिपोर्ट के अनुसार साल 1984 से 2019 तक मलावी के वनों का 80 फीसदी हिस्सा खत्म हो गया। इसी वजह से साल 2014 में जीव विज्ञानियों की खोज के बावजूद बौने गिरगिट नहीं पाए गए थे। तब इन्हें लुप्तप्राय जीवों की रेड लिस्ट में शामिल किया गया था।

 

Image courtesy- Krystal Tolley Via/CNN

 

1998 में बदला गया था रहने का स्थान
रिपोर्ट के अनुसार साल 1992 में बौने गिरगिट का पहली बार वर्णन मिलने के बाद इन पर शोध किया गया। इनके जीवित रहने की संभावनाओं में पाया गया कि वनों की कटान इनके अस्तित्व के लिए खतरा है। उस वक्त विज्ञानियों ने मलावी हिल्स में वनों की अधिक कटान के संकेत मिलने पर कुछ बौने गिरगिट को 1998 में मलावी के मिकुंडी में करीब 95 किलोमीटर दूर स्थानांतरित कर दिया था।

मलावी के जंगलों में विचरण करते दिखा
साल 2001 में जब विज्ञानियों ने रिलीज साइट का दौरा किया गया तो ये बौने गिरगिट जीवित मिले थे। वहीं, साल 2014 में वहां खोजने पर भी गिरगिट की यह प्रजाति नहीं मिली थी। इसकी वजह वनों के अधिक कटान को माना गया था। 2014 के बाद अब फिर से बौने गिरगिट को विचरण करते देखा गया है। विज्ञानियों का मानना है कि यह प्रजाति खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।…Next

 

 

 

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