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हर हर महादेव

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हर हर महादेव के नारे, जगह जगह भंडारे और विहंगम दृस्य से औत प्रौत नज़ारे। यही है बाबा अमरनाथ बर्फानी के यहाँ पहुचने का सीधा और सरल रास्ता। जहा जगह जगह श्रद्धालु बाबा के गाने में अपने आपको भिगोते हुए और उन्ही की मस्ती में खोते हुए बाबा की उस अनोखी गुफा की जहा वह स्वयं बर्फानी रूप में लोगो को दर्शन देते है। दुर्गम मार्ग को भी भक्तो के लिए सुगम सा प्रतीत करा देते है।

 

 

 

भक्त झूमते गाते उठते बैठते बाबा को याद करते हुए दुर्गम और रमणीय छेत्र का अनद उठाते हुए उनके दरबार में हाज़री लगते है। बाबा अमरनाथ के दर्शन होते ही मन और तन दोनों ही चहक उठते है। बाबा की अनुकम्पा से भक्तो में पूरा जोश भर जाता है। मिलिट्री के जवान हर वक़्त सहायता करने को तत्पर रहते है। जैसे बाबा ने उन्हें मुस्तैदी से अपने भक्तो की आओ भगत में लगाया हो। यात्रिओ की पूरी सुविदाओ को ध्यान में रखते हुए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की जाती है।

 

 

 

पहेल्गाओं से ७ किलोमीटर पर चंदनवाड़ी वहा से पिस्सू टॉप फिर गणेश टॉप होते हुए शेषनाग और पंचतरिणी के रास्ते भक्त बाबा के दरबार की ओरबढ़ते है | बाबा की गुफा से पहले ओर आखरी पदाओ होता है संगम टॉप जहा से बाबा की पावन गुफा के दर्शन किये जा सकते है। गुफा संगम टॉप से २ किलोमीटर दोर्री पे है। यहाँ अमर गंगा बहती है। बर्फ ही बर्फ होती है चारो ओर पर बाबा की गुफा के आस पास कोई बर्फ नहीं होती है। जब आप गुफा में प्रवेश करते हो तभी से वातावरण शिव मय हो जाता है। अनद सागर में डूब जाने का सा मोहाल हो जाता है। उस दृस्य का वर्णन मैं अपने इस छोटे से लेख नहीं कर रहा हूँ क्योकि उस भव्यता का वर्णन सायद बाबा बर्फानी ही कर पाये की कैसे वह उस गुफा में लिंग रूप में प्रकट होते है।

 

 

 

वर्ष २०१४ जून २८ से शुरू हुई बाबा अमरनाथ की पवित्र यात्रा इस बार इतनी बर्फ बारी थी कि पहेल्गाओं का रास्ता तो बंद ही रहा २ जुलाई २०१४ तक। बचा एक रास्ता बालटाल से १४ किलोमीटर की खड़ी चढाई। यात्रियों की संख्या में इजाफा होता जा रहा था क्योकि एक रस्ते पे दो रस्ते के लोगो को सफर करना था। कारन यह था कि दूसरा रास्ता कब खुलेगा किसी को नहीं पता था। १५-१५ फ़ीट तक बर्फ जमी थी और जमती ही जा रही थी जितनी सिद्दत से बर्फ को मिलटरी वाले साथ मिलकर साफ़ करवा रहे थे उससे ज्यादा बर्फ दूसरी सुबह उन्हें मिल रही थी साफ करने के लिए।

 

 

 

बालटाल से तो बड़ी ही सीधी यानी खड़ी चढाई है उस पर बर्फ और दोगुने इंसानो सफर जिसकी पूरी जिम्मेदारी हमारे जवानो के साहस से ही संभव हो सकती है क्योकि दुर्गम मार्ग में खच्चर, पालकी, पिट्ठू और पैदल यात्री दर्शन को उतावले हो बाबा के दरबार कि तरफ बढ़ रहे थे। वैसे वह कि पुलिस का रवैया कुछ अछा नहीं लगा मुसाफिरों के प्रति। पित्थूवाले, पालकीवाले, और तो और खच्चरवाले भी यात्रियों से गलत व्यवहार कर रहे थे। कुछ यात्रियों को भद्दे सब्दो का उपयोग किया तो किन्ही के उपर जूता फेक के मारा। शायद इस देश कि एहि विडम्बना रही है तभी तो गैर तो गैर जब अपने ही मुल्क के लोग उसे अपना नहीं समझते तो दूसरे तो हमेसा ही इसका फायदा उठाएंगे। जम्मू कश्मीर उसमे भी कश्मीर के लोगो की जनता ही नहीं मानती की कश्मीर हिंदुस्तान का अभिन्न अंग है तभी तो कई दुकानो पे बड़ा बड़ा लिखा था।

 

 

 

डिस्क्लेमर : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण जंक्शन किसी भी दावे या आंकड़े का समर्थन नहीं करता है।

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