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तन-मन से यदि है सबल

nishibansal28

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तन-मन से यदि है सबल, फिर यहाँ किसका है डर।
मन की हार तन की हार, मानकर बनता दुर्बल।
गीता में कहा कर्म कर, कर्मभू पर कर्म कर।
मन दर्पण में हार न देख, मन रखो हर तरह सबल
निकल जाये सारा डर।

उत्साह की अँगुली पकड़, जहाँ चाहो चढ़ जाओ।
असफल यदि हो जाओ और अधिक लगन लगाओ।
संकल्पो की भूमि पर, गिर उठकर चढ़ना सीखें।
यदि कहीं पर फिसल गए, उठना-उठाना सीखें।
निडर बन जीना सीखे।

मन को नही विश्राम, वह पहुंचे सकल संसार।
करे अति असम्भव काम जब हो उच्चतम विचार।
मनोबल से गाँधी ने किया देश को आजाद।
मन जीते जग जीत, यह नानक की आवाज
समझ मन का गुप्त राज।

मन की निर्बलता करती, साहसी शक्ति का हास,
अन्ना की हार करती क्रोधी भाव का विकास।
मन से हारकर होगा विजय पाना क्या सम्भव।
इसीलिये जीतकर करनी है यह साधना अमर।
दिल लगाकर के कर्म कर।

 

डिस्क्‍लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्‍वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी तरह के दावे, तथ्‍य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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