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कौन सी आज़ादी ?जागरण जंक्शन फोरम

chandravilla
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ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम ,सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं,ऐ मेरे वतन के लोगों आदि देश भक्ति के गीत सभी देशवासियों के ह्रदय में ,देश के लिए मर मिटने का जोश पैदा करते हैं.आज जब इसी स्वाधीनता दिवस की ६५ वी वर्षगाँठ हम मनाने जा रहे हैं,तो उत्साह तो है,पर कुछ ज्वलंत प्रश्न भी स्वर्गीय श्री राजीव दीक्षित के व्याखानों को पढकर मन में उत्पन्न हुए जिनका कोई संतोषजनक  उत्तर मुझको नहीं मिला.आप के समक्ष उन विचारों का कुछ अंश प्रस्तुत कर रही हूँ. जो राजीव जी के किसी मित्र द्वारा शेयर किये गए हैं .

आपने देखा होगा कि परम सम्मानीय भाई राजीव दीक्षित जी बराबर सत्ता के हस्तांतरण के संधि के बारे में बात करते थे और आप बार बार सोचते होंगे कि आखिर ये क्या है ? परम सम्मानीय भाई राजीव दीक्षित जी के अलग अलग व्याख्यानों में से इन सब को जोड़ के आप लोगों के लिए सत्ता के हस्तांतरण के संदर्भ में लेख प्रस्तुत है ,आशा है सभी इन विचारों से प्रभावित होंगें

सत्ता के हस्तांतरण की संधि (Transfer of Power Agreement)
( Transfer of Power Agreement ) अर्थात भारत की आज़ादी की संधि ।ये इतनी खतरनाक संधि है की अगर आप अंग्रेजों द्वारा सन 1615 से लेकर 1857 तक किये गए सभी 565 संधियों या कहें साजिश को जोड़ देंगे तो उस से भी ज्यादा खतरनाक संधि है ये 14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं आई बल्कि ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट हुआ था पंडित नेहरु और लोर्ड माउन्ट बेटन के बीच में ।Transfer of Power और Independence ये दो अलग चीजे है ।स्वतंत्रता और सत्ता का हस्तांतरण ये दो अलग चीजे है ।और सत्ता का हस्तांतरण कैसे होता है ? आप देखते होंगे क़ि एक पार्टी की सरकार है, वो चुनाव में हार जाये, दूसरी पार्टी की सरकार आती है तो दूसरी पार्टी का प्रधानमन्त्री जब शपथ ग्रहण करता है, तो वो शपथ ग्रहण करने के तुरंत बाद एक रजिस्टर पर हस्ताक्षर करता है, आप लोगों में से बहुतों ने देखा होगा, तो जिस रजिस्टर पर आने वाला प्रधानमन्त्री हस्ताक्षर करता है, उसी रजिस्टर को ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर की बुक कहते है और उस पर हस्ताक्षर के बाद पुराना प्रधानमन्त्री नए प्रधानमन्त्री को सत्ता सौंप देता है ,और पुराना प्रधानमंत्री निकल कर बाहर चला जाता है ।

यही नाटक हुआ था 14 अगस्त 1947 की रात को 12 बजे । लार्ड माउन्ट बेटन ने अपनी सत्ता पंडित नेहरु के हाथ में सौंपी थी, और हमने कह दिया कि स्वराज्य आ गया ।कैसा स्वराज्य और काहे का स्वराज्य ? अंग्रेजो के लिए स्वराज्य का मतलब क्या था ?और हमारे लिए स्वराज्य का मतलब क्या था ? ये भी समझ लीजिये ।अंग्रेज कहते थे क़ि हमने स्वराज्य दिया, माने अंग्रेजों ने अपना राज तुमको सौंपा है ताकि तुम लोग कुछ दिन इसे चला लो जब जरुरत पड़ेगी तो हम पुनः आ जायेंगे । ये अंग्रेजो का interpretation (व्याख्या) था ।और हिन्दुस्तानी लोगों की व्याख्या क्या थी कि हमने स्वराज्य ले लिया ।और इस संधि के अनुसार ही भारत के दो टुकड़े किये गए और भारत और पाकिस्तान नामक दो Dominion States बनाये गए हैं ।ये Dominion State का अर्थ हिंदी में होता है एक बड़े राज्य के अधीन एक छोटा राज्य, ये शाब्दिक अर्थ है और भारत के सन्दर्भ में इसका असल अर्थ भी यही है ।अंग्रेजी में इसका एक अर्थ है “One of the self-governing nations in the British Commonwealth” और दूसरा “Dominance or power through legal authority “।Dominion State और Independent Nation में जमीन आसमान का अंतर होता है ।मतलब सीधा है क़ि हम (भारत और पाकिस्तान) आज भी अंग्रेजों के अधीन/मातहत ही हैं।

गाँधी जी कहते थे कि मै मानता नहीं कि कोई आजादी आ रही है ।और गाँधी जी ने स्पष्ट कह दिया था कि ये आजादी नहीं आ रही है सत्ता के हस्तांतरण का समझौता हो रहा है |और गाँधी जी ने नोआखाली से प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी ।उस प्रेस स्टेटमेंट के पहले ही वाक्य में गाँधी जी ने ये कहा कि मै हिन्दुस्तान के उन करोड़ों लोगों को ये सन्देश देना चाहता हु कि ये जो तथाकथित आजादी आ रही है, ये मै नहीं लाया ।ये सत्ता के लालची लोग सत्ता के हस्तांतरण के चक्कर में फंस कर लाये है ।मै मानता नहीं कि इस देश में कोई आजादी आई है ।और 14 अगस्त 1947 की रात को गाँधी जी दिल्ली में नहीं थे नोआखाली में थे । भारत की राजनीति का सबसे बड़ा पुरोधा जिसने हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की नीव रखी हो वो आदमी 14 अगस्त1947 की रात को दिल्ली में मौजूद नहीं था ।क्यों ? इसका अर्थ है कि गाँधी जी इससे सहमत नहीं थे ।(नोआखाली के दंगे तो एक बहाना था असल बात तो ये सत्ता का हस्तांतरण ही था) और 14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं आई …. ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट लागू हुआ था पंडित नेहरु और अंग्रेजी सरकार के बीच में

अब शर्तों की बात करता हूँ , सब का जिक्र करना तो संभव नहीं है लेकिन कुछ महत्वपूर्ण शर्तों की जिक्र जरूर करूंगा जिसे एक आम भारतीय जानता है और उनसे परिचित है ……………

· इस संधि की शर्तों के मुताबिक हम आज भी अंग्रेजों के अधीन/मातहत ही हैं ।वो एक शब्द आप सब सुनते हैं न Commonwealth Nations ।अभी कुछ दिन पहले दिल्ली में Commonwealth Game हुए थे आप सब को याद होगा ही और उसी में बहुत बड़ा घोटाला भी हुआ है ।ये Commonwealth का मतलब होता है समान सम्पति ।किसकी समान सम्पति ? ब्रिटेन की रानी की समान सम्पति ।आप जानते हैं ब्रिटेन की महारानी हमारे भारत की भी महारानी है और वो आज भी भारत की नागरिक है और हमारे जैसे 71 देशों की महारानी है वो ।Commonwealth में 71 देश है और इन सभी 71 देशों में जाने के लिए ब्रिटेन की महारानी को वीजा की जरूरत नहीं होती है क्योंकि वो अपने ही देश में जा रही है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को ब्रिटेन में जाने के लिए वीजा की जरूरत होती है क्योंकि वो दूसरे देश में जा रहे हैं।

· मतलब इसका निकाले तो ये हुआ कि या तो ब्रिटेन की महारानी भारत की नागरिक है या फिर भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश है इसलिए ब्रिटेन की रानी को पासपोर्ट और वीजा की जरूरत नहीं होती है अगर दोनों बाते सही है तो 15 अगस्त 1947 को हमारी आज़ादी की बात कही जाती है वो झूठ है ।और Commonwealth Nations में हमारी एंट्री जो है वो एक Dominion State के रूप में है न क़ि Independent Nation के रूप में।इस देश में प्रोटोकोल है क़ि जब भी नए राष्ट्रपति बनेंगे तो 21 तोपों की सलामी दी जाएगी उसके अलावा किसी को भी नहीं ।लेकिन ब्रिटेन की महारानी आती है तो उनको भी 21 तोपों की सलामी दी जाती है, इसका क्या मतलब है? और पिछली बार ब्रिटेन की महारानी यहाँ आयी थी तो एक निमंत्रण पत्र छपा था और उस निमंत्रण पत्र में ऊपर जो नाम था वो ब्रिटेन की महारानी का था और उसके नीचे भारत के राष्ट्रपति का नाम था मतलब हमारे देश का राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक नहीं है ।ये है राजनितिक गुलामी, हम कैसे माने क़ि हम एक स्वतंत्र देश में रह रहे हैं ।एक शब्द आप सुनते होंगे High Commission ये अंग्रेजों का एक गुलाम देश दूसरे गुलाम देश के यहाँ खोलता है लेकिन इसे Embassy नहीं कहा जाता ।एक मानसिक गुलामी का उदहारण भी देखिये …….
भारत का नाम INDIA रहेगा और सारी दुनिया में भारत का नाम इंडिया प्रचारित किया जायेगा और सारे सरकारी दस्तावेजों में इसे इंडिया के ही नाम से संबोधित किया जायेगा ।हमारे और आपके लिए ये भारत है लेकिन दस्तावेजों में ये इंडिया है ।संविधान के प्रस्तावना में ये लिखा गया है “India that is Bharat ” जब क़ि होना ये चाहिए था “Bharat that was India ” लेकिन दुर्भाग्य इस देश का क़ि ये भारत के जगह इंडिया हो गया ।ये इसी संधि के शर्तों में से एक है ।अब हम भारत के लोग जो इंडिया कहते हैं वो कहीं से भी भारत नहीं है ।कुछ दिन पहले मैं एक लेख पढ़ रहा था अब किसका था याद नहीं आ रहा है उसमे उस व्यक्ति ने बताया था कि इंडिया का नाम बदल के भारत कर दिया जाये तो इस देश में आश्चर्यजनक बदलाव आ जायेगा और ये विश्व की बड़ी शक्ति बन जायेगा अब उस शख्स के बात में कितनी सच्चाई है मैं नहीं जानता, लेकिन भारत जब तक भारत था तब तक तो दुनिया में सबसे आगे था और ये जब से इंडिया हुआ है तब से पीछे, पीछे और पीछे ही होता जा रहा है ।

भारत के संसद में वन्दे मातरम नहीं गया जायेगा अगले 50 वर्षों तक यानि 1997 तक ।1997 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने इस मुद्दे को संसद में उठाया (राजीव दीक्षित के कहने पर) तब जाकर पहली बार इस तथाकथित आजाद देश की संसद में वन्देमातरम गाया गया ।50 वर्षों तक नहीं गाया गया क्योंकि ये भी इसी संधि की शर्तों में से एक है ।और वन्देमातरम को ले के मुसलमानों में जो भ्रम फैलाया गया वो अंग्रेजों के दिशानिर्देश पर ही हुआ था ।इस गीत में कुछ भी ऐसा आपत्तिजनक नहीं है जो मुसलमानों के दिल को ठेस पहुचाये ।

उपरोक्त विचार सुने तो पूर्व में भी थे परन्तु उनपर मंथन नहीं किया था .आज जागरण द्वारा प्रस्तुत विषय पर ·मैं अपने ज्ञान वर्धन के लिए आपके समक्ष स्वाधीनता दिवस से सम्बद्ध विचार रख रही हूँ ,इनमें अनुचित क्या है? क्यों इन विचारों से सत्ताधीश सहमत नहीं होते .इनमें जो कुछ भी गलत है कृपया
मुझको अवश्य बताएं .अब हमें वास्तविक आज़ादी चाहिए जहाँ कोई भूखा नग्न न रहे ,सबकी मूलभूत आवश्यकताएं पूर्ण हों,किसी किसान को आत्महत्या न करनी पड़े देश का धन देश के विकास में लगे और हम सिर उठाकर जी सके और दुनिया  में हम शीर्ष पर हों और मार्ग दर्शन करें एक सुन्दर ,सुखद भविष्य के लिए .

अमर उजाला  से मिली एक जानकारी के अनुसार 15 अगस्त ,26 जनवरी ,2 अक्टूबर जिनको हम आज तक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाते आ रहे हैं से सम्बन्धित कोई भी अभिलेख सरकार के पास नहीं है कि इन दिवसों को स्वतंत्रता दिवस ,गणतंत्र दिवस तथा महात्मा गाँधी के जन्म दिवस को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मान्यता कब से और कैसे मिली.

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