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“दामाद” को पूजने की प्रथा है भई

robert vadraकिसी खास परिवार के लिए खास तरह की वफादारी के भारत में कई उदाहरण मिल सकते हैं. वर्तमान में देश की सबसे बड़े सियासी परिवार (गांधी-नेहरू परिवार) के प्रति वफादारी का अपना ही राजनीतिक महत्व है. इसका एक उदाहरण उस समय देखने को मिला जब जनलोकपाल आंदोलन के रास्ते राजनीति में कूदे पड़े अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा पर सैकड़ों करोड़ रुपए के हेरफेर का आरोप लगाया.


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अरविंद अपने पूरे बहीखाते के साथ मीडिया से मुखातिब हुए. उन्होंने इधर-उधर की बातें न करके इस बार कांग्रेस की नब्ज को पकड़ने की कोशिश की. उन्होंने सीधे गांधी परिवार के दमाद राबर्ट वाड्रा पर आरोप लगाते हुए कहा कि रियल एस्टेट डेवलपर डीएलएफ समूह ने गलत तरीकों से रॉबर्ट वाड्रा को 300 करोड़ रुपयों की संपत्तियां कौड़ियों के दामों में दे दीं. अरविंद के इस आरोप का सीधा मतलब है कि डीएलएफ़ समूह ने रॉबर्ट वाड्रा के प्रभाव के देखते हुए परोक्ष रूप से गांधी परिवार के प्रति वफादारी निभाई.


राबर्ट वाड्रा के सामने प्रधानमंत्री के आरोप भी छोटे

अरविंद ने जैसे ही प्रियंका गांधी के पति और राहुल गांधी के जीजा रॉबर्ट वाड्रा पर घपले के आरोप लगाए उसके बाद से ही आलाकमान से लेकर कांग्रेस का हर सिपहसालार गांधी परिवार के इस दामाद को बचाने में लग गया. कांग्रेस का हर बड़ा नेता अरविंद की कड़ी निंदा करते हुए अपनी प्रतिक्रिया देने लगा. ऐसा लग रहा था कि इन वफादारों के सामने मंहगाई, भ्रष्टाचार और घोटाले पर प्रतिक्रिया देना कोई बड़ा मुद्दा नहीं है जितना कि वाड्रा पर दिए गए अरविंद के बयान को खारिज करना. यहां तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर लगे आरोप भी छोटे लग रहे थे जिन्हें विपक्ष से लेकर अरविंद और उनकी टीम पिछले एक सालों से उन पर लगाती आ रही थी. अरविंद के इस आरोप पर इनमें से कुछ नेताओं के बयान ऐसे हैं कि यदि उन्हें मीडिया में सार्वजनिक तौर पर अरविंद को गाली देने की छूट होती तो वे वह भी कर देते.


वफादारी का ईनाम यहां मिलता ही है

देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी (कांग्रेस) के प्रति वफादारी कोई नई बात नहीं हैं. यह तो नेहरु और इंदिरा गांधी के समय से चली आ रही है. उस समय की वफादारी का ही नतीजा है कि आज कोई कानून मंत्री तो कोई गृह मंत्री पद लिए बैठा है. इस परिवार के प्रति गैर-वफादारी का मतलब है किसी व्यक्ति, नेता और मंत्री का पूरा राजनैतिक कॅरियर दांव पर लगना. इस परिवार को लेकर ऐसा माना जाता है कि यदि किसी को अपना भविष्य उज्ज्वल करना है तो इस परिवार की शरण में आ जाए. यह परिवार उस व्यक्ति को मामूली सब-इंस्पेक्टर से देश का गृह मंत्री भी बना सकता है.

अब यहां सवाल उठता है किसी परिवार को लेकर इतनी वफादारी किसी भी लोकतंत्र के लिए कहां तक सही कही जा सकती है. लोकतंत्र में जनता ही सर्वेसर्वा होती है लेकिन यहां एक परिवार को ही लोकतंत्र का सर्वेसर्वा मान लिया गया. यहां जनता की सेवा नहीं बल्कि इस परिवार की सेवा ही चुनाव में टिकट दिलाता है. देश जब भ्रष्टाचार और घोटाले को लेकर कांग्रेस पर आरोप लगाता है तो कांग्रेस इस बात को सहन कर सकती है लेकिन वही आरोप जब गांधी परिवार पर लगता है तो कांग्रेस के वफादार बिदक जाते हैं.


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