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विश्व हिंदी दिवस: “निज भाषा उन्नति” बगैर समृद्धशाली राष्ट्र की कल्पना संभव नहीं !!

Dr. Mukesh Kumar Srivastava
Dr. Mukesh Kumar Srivastava
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“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।

अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन,
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।” – भारतेंदु हरिश्चंद्र

 

 

आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र की ये पंक्तियां कालजयी हैं। आज इनके जिक्र के पीछे का मर्म आप भी समझ रहे होंगे। असल में आज जब देश और दुनिया में विश्व हिंदी दिवस मनाया जा रहा है तो बरबस ही हिंदी साहित्य के पितामह और उनकी पंक्तियां याद आ रही हैं, जिन्होंने आज से करीब डेढ़ शताब्दी पहले निज भाषा को सभी उन्नतियों का मूल बता दिया था। साथ ही, अंग्रेजी से भविष्य में मिलने वाली चुनौती की तरफ भी अपनी विहंगम दृष्टि डाली थी।

भाषा संवाद स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम होती है। भाषा का उपयोग कर मनुष्य अपने भावों को अभिव्यक्त कर पाता है। मानव जगत की यही विशेषता है, जो उसे अन्य प्राणियों से भिन्न करती है। पूरे विश्व में करीब 6809 से अधिक भाषाएं और अनगिनत बोलियां हैं, जिसमें से एक हिंदी भी है। विश्व की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से हिंदी एक है। यह विवाद ही निरर्थक है कि हिंदी का नाम भाषाओं में किस क्रम पर आता है। वैसे तो उपयोग की दृष्टि से देखें तो हिंदी ही ऐसी भाषा है, जिसे विश्व की प्रथम भाषा के रूप में इसे स्वीकार किया जा सकता है।

भारत पूरी दुनिया में सबसे विविध देशों में से एक है, जहाँ विभिन्न धर्म, रीति-रिवाज, परंपराएं, व्यंजन, भाषाएं और बोलियां हैं। हिंदी भाषा भारत की सबसे प्रमुख भाषाओं में से एक है। हमारे देश में, हिंदी वह भाषा है जिसे कमोबेश हर कोई आसानी से समझता और बोलता है। भारत में हिंदी का एक गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। यही नहीं पूरे विश्व में हिंदी की एक अलग पहचान है।

यूं तो हर तारीख का कोई न कोई इतिहास और महत्व होता है, लेकिन आज का दिन अर्थात 10 जनवरी का इतिहास कई मायनों में, खासतौर पर हिंदी प्रेमी तथा हिंदी भाषी लोगों के लिए काफी अहम है। आज ही के दिन “विश्व हिंदी दिवस” देश-विदेश में व्यापक रूप में मनाया जाता है।

हिन्दी एक आकर्षक एवं मोहक भाषा है। यही कारण है कि बेल्जियम के बुल्के और रूस के वरान्निकोव भारत आकर हिन्दी भाषा के प्रति समर्पित हो गए। बोलने को तो वैसे अनेकों भाषाएँ बोली जाती है परन्तु हिंदी भाषा की अपनी ही चमक है। हिंदी फिल्में और हिंदी गीत-संगीत पूरी दुनिया को अपनी ओर लुभाता रहा है। एक खबर के मुताबिक़, विश्व के करीब 40 देशों के 600 से भी ज्यादा विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में हिंदी पढ़ाई जाती है। मॉरीशस, फिजी, नार्वे, फिनलैंड, हंगरी, बेल्जियम,नेपाल, श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन,  जापान, इटली और कई अन्य अफ्रीकी देशों में हिंदी का पठन-पाठन हो रहा है। इन देशों में हिंदी के पाठकों और लेखकों की एक बड़ी संख्या है।

परन्तु एक महत्वपूर्ण पक्ष ऐसा भी जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि विश्व की प्रमुख भाषा होने के बावजूद भी हिंदी की स्थिति को वह मजबूती क्यों नहीं मिल पाई है, जैसी की उसे मिलनी चाहिए थी। बात किसी एक दिवस को मनाने की नहीं है, बल्कि जरूरत है कि हिन्दी और इससे जुड़ी संस्थाओं का और व्यापक रूप में प्रचार-प्रसार हो। परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि हम दूसरी भाषाओं, जैसे अंग्रेजी का विरोध करें या इसके वर्चस्व को समाप्त करने का प्रयास करें।

विडंबना देखिये कि हमारे ही देश में जो नियम-कायदे बनाये जाते रहे हैं, या जो फैसले लिए जाते रहे हैं, उनकी भाषा अंग्रेजी ही रखी जाती है। यह तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का कुशल नेतृत्व एवं उनकी दूरदर्शिता रही कि जिन्होंने सत्ता में आते ही हिंदी भाषा पर विशेष बल दिया। परन्तु सवाल यह उठता है कि हमारा क्या कर्त्तव्य बनता है? केवल सरकार से ही उम्मीद लगा कर बैठना उचित है? हमारे ही देश में उन लोगों को प्राथमिकता दी जाती है जो अंग्रेजी में बोलते या अंग्रेजी में साक्षात्कार देते हैं।

हमारा देश वैसे तो 1947 में स्वाधीन हो गया परंतु वैचारिक और मानसिक दृष्टि से हम आज भी अंग्रेजी भाषा के दास नजर आते हैं। हिन्दी को हीन भाव से देखना और अंग्रेजी को अमृत-सागर समझने की हमारी मान्यता आज भी नहीं बदली है। सवाल है कि हिन्दी के प्रति हीनता का यह भाव राष्ट्र को क्या उन्नति के शिखर पर ले जा पायेगा? याद रहे कि कोई भी राष्ट्र अपनी भाषा का आदर किये बगैर विकसित एवं समृद्धशाली नहीं हो सकता। जर्मनी, जापान, रूस, फ़्रांस जैसे अनेकों राष्ट्र इसके उदाहरण हैं। ये अपनी भाषा पर गर्व महसूस करते हैं तो हम क्यों नहीं? आज जब भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्व में हिन्दी भाषा को अपनाया और सराहा जा रहा है, तो फिर हम अपने ही देश में रहकर अपनी भाषा को बढ़ावा देने के बजाय उसको खत्म करने पर क्यों तुले हैं?

सांस्कृतिक व भाषाई विविधता से भरे भारत में हिन्दी भाषा सदियों से पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोने का काम कर रही है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हिंदी सबसे प्राचीन एवं प्रभावशाली भाषाओं में से एक है। ऐसे में हमें अपनी हिंदी भाषा को बोलने और लिखने में गर्व महसूस करना चाहिए। सवाल है कि क्या हम इस दिशा में सफल हो पाए हैं? आज हम सभी को खुद से यह पूछना चाहिए और सोचना चाहिए कि कैसे हमारी मातृ-भाषा को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर और भी मजबूती मिले।

विश्व हिन्दी दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य हिंदी को विश्व में प्रचारित-प्रसारित करना, हिंदी के प्रति जागरूकता पैदा करना, इसके प्रति अनुकूल वातावरण तैयार करना, हिंदी के प्रति लोगों में अनुराग पैदा करना और इसे अंतर्राष्ट्रीय पटल पर विश्व-भाषा के रूप में स्थापित करना है।

भारतीय भाई-बहनों, चाहे वह अप्रवासी ही क्यों न हो, हम सभी का यह कर्त्तव्य बनता है कि सरकार के साथ कदम से कदम मिलकर इस दिशा में एक सजग प्रयास करें। क्षेत्रीयता की भावना से उपर उठकर हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करें। हम सभी को यह समझना पड़ेगा कि हिन्दी ना केवल एक भाषा है, बल्कि एक आशा है। भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् के मौजूदा अध्यक्ष तथा राज्य सभा सदस्य डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने हाल ही में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा आयोजित दीक्षांत समारोह के दौरान अपने वक्तव्य में ठीक ही कहा कि “हिंदी हमें प्रेम, स्नेह, करुणा और ममता सिखाती है। ये परिवार एवं समाज को एक कड़ी में बांधकर रखते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। इस दृष्टि से देखें तो हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं बल्कि सम्पूर्ण संस्कृति है”। आइये हम सभी अपनी इस अमूल्य धरोहर के संरक्षण, संवर्धन एवं प्रचार-प्रसार का संकल्प लें, और इसे विश्व-पटल पर स्थापित करने में अपनी महती भूमिका निभाएं।

 

डॉ. मुकेश कुमार श्रीवास्तव, 
सलाहकार, 
भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् (विदेश मंत्रालय), 
नई दिल्ली 

 

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