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स्वरोजगार या नौकरी ?

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आज के परिदृश्य में देखें तो नौकरी लग जाने की दुआ देना किसी के लिए भी मन चाही इच्छा के पूरी होने जैसा है…उस पर भी सरकारी नौकरी …क्या कहने ! मेरे दादा या परदादा के समय नौकरी के पीछे भागने का craze नहीं ही था.

यह कुछ 50 वर्ष से हवा उठी और नौकरी खोज पाना अपने आप में एक काम बन गया .. रोजगार देने वाले भी बढ़ गए… लोगों ने कम समय में अधिक कमाने के लिए खेती धीरे धीरे छोड़ दी. हालत यह हैं कि जिनके खेतों में पर्याप्त उपज होने अतिरिक्त बेचने लायक उपज होती भी है वह भी नौकरी करने वाले हो गए.

खेती महत्वपूर्ण … थी है और रहेगी. इसके अतिरिक्त देश की आर्थिकी में हर हाथ के  काम का महत्व रहा है.

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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