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खामोशियों को सुनकर लडखडाती सरकार

रायशुमारी
रायशुमारी
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इस देश का राजनैतिक इतिहास उठाकर पढ़ लीजिये की सरकार के हारने का सबब कोई और नही बल्कि सरकार खुद बनती है । अगर मोदी ने एमरजेंसी को नही पढ़ा है , जनता दल को नही देखा है , 2002 के बाद अटल को नही समझा या 2013 में मनमोहन की खामोशी नही सुनी तो शायद इस फेहरिस्त में मुझे अगला नाम उनका ही लिखना पड़ेगा । जब भी नेता चुनावो के दौरान जनता के करीब आया है  तब तब जनता ने उसे सियासत की सबसे बड़ी कुर्सी पर बिठाया है । सरकार चलाने के बीच जनता उसे अपने बिच अगर गैर मौजूद पाती है तो फिर सियासी कुर्सी में लगी कील भी थोड़ी थोड़ी उखड़ने लगती है । अगर ये दूरी कम न की गयी तो शायद कुर्सी के लड़खड़ाने में ज़्यादा वक़्त नही लगेगा । जब जब ये कुर्सी लड़खड़ायी है तब तब उसकी आवाज़ सुनकर एक मज़बूत विपक्ष खड़ा हुआ है । लेकिन अगर ये विपक्ष कोई राजनैतिक पार्टी न होकर जनता बन जाए तो फिर क्रांति होती है । हर सवाल पूछने वाला भी अपने देश से उतना ही प्यार करता है जितना एक बच्चा अपनी माँ से करता है । लेकिन अगर सवाल का जवाब न देकर उसे देशद्रोही कहा जाने लगे तो नफरत होगी । लेकिन कोई अपनी माँ से नफरत नही करेगा । नफरत पनपेगी तो उस हुक्मरान के लिए जिसने अपनी मिट्टी की नब्ज़ पूछने के बदले में देशद्रोही कहा गया । कुर्सी वही रहती है लेकिन उसपर बैठने वाला बदलता है । लेकिन अगर ये सत्ता अपनी ही  पैरो पर कुल्हाड़ी मारती रही तो शायद कुर्सी छोड़कर दोबारा खड़े होने में काफी वक़्त लग जाए । देश की जनता सवाल करती है , हम सवाल करते है क्योंकि हमे शक है हुक्मरान पर अपनी मिटटी पर नही । सवालो के अगर जवाब न मिले तो हो सकता है दोबारा सत्ता भी न मिले ।

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