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रेपारोपण

dhairya
dhairya
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ये दिलवालों की दिल्ली कब तलक ऐसे ही सोयेगी …
इज्जत-आबरू अबला कहां तक आप ढोयेगी ….
दरिंदों को कुचलने से नहीं इंसाफ़ अब हासिल
खुलेंगे कान उस दिन जब बहन इनकी भी रोयेगी …

प््राशासन लाख चाहे भी तो कारावास ही होगा
मुकदमे-तारीखें, दलीलें सब बकवास ही होगा
कुचल दो इन नामर्दों को, सरेराह सड़कों पर
तभी इन लहू के प्यासों को कुछ आभास भी होगा।

ये मर्दों की रवानी पर कलंकी आत्माएंे हैं ….
सुअर-कुत्तों और इनमें बड़ी समानताऐं हैं
ये वो ज़ालिम हैं, नाकरा हैं, बेदर्दी का चेहरा हैं …
नसीबों में कहां इन्हें सुख, करोड़ों यातनाऐं हैं … !

static150मयंक दीक्षित
8081523788

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