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मानसून इज़ कमिंग सून ………

dhairya
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आ गया प्रदेश में जम के मानसून है,
जन-जीव-जंतु व विज्ञान को सुकून है,
जल रही थी जि़दगी, अब ठंडा ’अर्थ’, ’मून’ है,
’प्रेसीडेंट का लाइव शो, अभी ’कमिंग सून’ है।

हाथी के भाग्य में अब सिर्फ साढ़े-साती है,
’कमल’ के भौंरे, अब और आत्मघाती हैं,
’हाथ’ में अब और कोई चीज़ नहीं आती है,
पेट्रोल-डीजल भूल, जनता अब ’साइकिल’ ही चलाती है।

कलाम को सलाम कहां, ममता में ममता नहीं
चिल्लाओ गला फाड़ के, कोई अब सुनता नहीं
सच्चाई, ईमानदारी का ’स्वेटर’ कोई अब बुनता नहीं
मिट्टी के बर्तन में शायद दही अब ’जमता’ नहीं ।

बदलेंगे मौसम-ऋतुएं, तुम रोक पाओगे कहां
मोह-माया त्याग अब कहीं और जाओगे कहां
छल-कपट-विश्वासघात हो रहा यहां-वहां
रह लो और दो-चार दिल फिर तो जाना है ’वहां’।
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