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दीपू …..एक सच्चा पागल

dhairya
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उसके भी वही हाथ-पैर, आंख-कान थे …..
पर कुदरत ने शायद उसे कुछ और भी बख्शा था … !

’’समाज का एक पाखंडी वर्ग एक नितांत सीधे-सच्चे, हंसमुख व प्रकृति की हर चीज़ से समान व्यवहार करने वाली आत्मा को कितनी आसानी से ’पागल’ कह देता है, जबकि हमारे लिए वह सच्ची-प्रेरणा हैं।’’

मैं कानपुर से लौटा था, हालचाल पूछने के बाद घरवालों ने चैन की सांस लेते हुए कहा कि ’’अब किरायेदार रख लिया है। कहीं आओ-जाओ तो सुरक्षा और घर में एक अपनापन व रौनक बनी रहती है। मेरे घर में मैं, और मेरे पापा-मम्मी ही हैं। लोगों की नज़रों में ये एक ’छोटा परिवार-सुखी परिवार’ है। पर सुखी तो है ही पर छोटा इसलिए नहीं लगा कि मैं घर में दो-चार भाई बहनों की कमी पूरी कर देता थर, फिर चाहे उसके लिए शैतानियां, जि़द, उछल-कूद कुछ भी करना पड़े। कुछ दिनों बाद मैंने अपने किरायेदार दीपू के बारे में अपने पिता जी से किसी को बात करते सुना ’’अरे दीक्षित जी, किसे रख लिया आपने , आधा पागल है ! उससे कोई सहारा थोड़े ही है’’। ऐसा होते होते कई दिन बीतने लगे, लोग उसे पागल कह जाते, मेरे पिता-माता जी भी उनकी बातेां में आकर सहमति में सिर हिला देते। पर जो भी उसे इस ’पागल’ शब्द से संबोधित करता उसके लिए मेरी नज़रों में इज्जत कम होती जाती। मुझे उसका एक कमरे में शांत रहना, पुराने गाने सुनना, आने-जाने वालों से हंसकर बात-चीत करना बड़ा अच्छा लगता था। खासकर जब उसके प्रिय मित्रों में से एक ’कुक्की’ से उसकी बातचीत होती थी
। एक दिन की बात है मैं अपने बाहर वाले कमरे में सोशल नेटवर्किंग कर रहा था तभी अचानक बंदरों के लड़ने की घनघोर-कर्कश ध्वनि कानों में पड़ी। एक-दो बार नज़रंदाज किया पर धीरे-धीरे शोर बढ़ता गया। बाहर खिड़की से झांका तो सन्न रह गया। एक ऐसा द्रश्य देखा जिसने मेरी दो पूर्वधारणाओं पर चोट की। बंदरों के लिए मैं सोचता था कि ये बड़े ही खूंख्वार जीव हैं, इन्हें कोइ्र फर्क नहीं पड़ता कि आप उन्हें नुकसान पहुंचा रहे हैं या नहीं , ज़रा सी गलतफहमी होने पर ये रूह पर बुरी तरह टूट पड़ते हैं। दूसरी धारणा ये कि दीपू डरपोंक है। भले ही वह सीधा-साधा, शांतिप्रिय है पर उसे दुनिया की कारगुज़ारियों से न तो कोई शिकायत है और न ही उसमें रूचि।
तो द्रश्य ये था कि कम से कम सत्तर-अस्सी बंदरों का झुंड आपस में कर्कश ध्वनि में शोर-गुल कर एक-दूसरे से लड़े जा रहा था। उस ’वानर-जंग’ में क्रोध और बदले का जबर्दस्त घी था, और जो भी उस वक्त हट्टा-कट्टा था सामने वाले कमज़ोर पर टूट पड़ रहा था। पर अचानक मेरी नजर दीपू पर पड़ती है जो उन बंदरों के बीच खड़े होकर मुस्करा रहा है। मैंने और देखने वालों ने सोचा कि आज तो ये ’पागल’ वास्तव में इस ’वानर-जंग’ की भेंट चढ़ गया। पर अचानकर मुझे कुछ शब्द सुनाई दिए ’’लगता है तुम भी इंसानों की तरह मार-काट पर उतर आये हो ..?’’, चिल्लाओ-चीखो खूब पर काटने की नहीं हो रही’’ ? समझे ..? दीपू वहां बंदरों का बीच-बिचाव कर रहा था। उन्हें संदेश दे रहा था। उसे यह भलीभांति पता था कि जब उसने उन बेज़ुबानों पर कभी प्रहार नहीं किया तो वे भी उस निरीह पर वार नहीं करेंगे। उसके चेहरे की मुस्कान न सिर्फ उसे बहादुर, सच्चा, सादगीपूर्ण इंसान साबित कर रही थी बल्कि समाज के उन ’समझदार’ लोगों की बचकानी सोच को धता बता रही थी जो उसे पागल कहा करते थे। हालांकि देखने वालों ने सहज दयाभाव से उसे वहां से हट जाने को कहा पर वह मन ही मन बुदबुदाया ’’अभी इनका झगड़ा निपटा दूं, हट जाउंगा।’’
मैंने उस चमत्कारिक द्रश्य को चंद कदमों से सींखचे की ओट से देखा कैसे वे दुर्दांत-क्रोधित बंदर उस महामानव की बातें सुनते-झगड़ते कुछ ही देर में उसके पास से शांत होकर गुज़र गये। एक भी बंदर ने उसे छुआ तक नहीं। वह मुस्कराया और अपनी लोहे की हल्की वाली कुरसी पर बैठ उस दुनिया में खो गया जहां श्रद्धा है, जहां विश्वास है, जहां किसी को चोट पहुंचाने जैसी बातें नहीं होतीं। जहां चीटी, बंदर, कुत्ते व इंसानों से एक जैसा व्यवहार किया जाता है। वही प्रेम, वही नफरत, वही डांट-फटकार, वही पुचकार।
उसकी रज़ा में जब कोई न छोटा न बड़ा है
फिर क्यूं तू घमंड-द्वेष के कांटों पे खड़ा है ………….. -मयंक दीक्षित
साकेतनगर, कानपुर।
8081523788

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