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कोयले का ’काला’ सच

dhairya
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आजादी के 66वें वर्ष की शुरूआत पर किसी देश का प्रधानमंत्री अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाता है, समस्याओं के समाधान के वादे करता है, पिछली गलतियों को भी सामने रखता है, पर दुर्भाग्य से दो दिन बाद नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक(कैग) की ओर से फरमान ज़ारी होता है कि कोल ब्लाॅक के आवंटन में मौजूदा प्रधानमंत्री 1.76 लाख करोड़ के गोलमाल में शामिल थे। अमर जवान तो ये कहकर विदा हो लिए कि अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों, पर शायद कुछ ’साथी’ दगाबाज साबित हुए, जिससे देश में समय-समय पर घपले-घोटालों का मायाजाल पनपता गया। कैग ने ना सिर्फ कोयला आवंटन में बंदरबांट पर सरकार को चेताया है बल्कि ऊर्जा व सिविल एविएशन भी घपलेबाजी का शिकार हुए हैं। इससे गोलमाल की कुल राशि 3.06 लाख करोड़ आंकी गई है। याद हो कि किसी टीम अन्ना(जो अब नहीं है) के सामने मनमोहन सिंह ने बयान दिया था कि यदि वे उनके द्वारा लगाये गये कोई भी आरोप सिद्ध हुए तो वे सन्यास ले लेंगे पर अनहोनी से केंद्र की इस जांच संस्था ने उनपर ये गंभीर आरोप जड़ दिए हैं। आनन-फानन उनके बचाव में मौजूदा कोयला मंत्री ने कैग की निष्पक्षता पर सवाल उठा गये जिससे जनता व विपक्ष की असहमति लाजि़मी है। पुरानी कहावत के अनुसार कोयले की कोठरी से कोई साफ-सुथरा कैसे वापस आ सकता है, तो चरितार्थ हो ही रही है साथ ही सरकार का कैग पर सवालिया निशान यह बयां कर रहा है कि वही जांच संस्था ’निष्पक्ष’ है जो पक्ष में फैसले सुनाती रहे। चलो मान लिया जाये कि कैग ने सरकार के पक्ष में इरादतन कड़ा रूख अख्तियार कर लिया है, पर काॅमनवेल्थ, टूजी, एनआरएचएम जैसे बड़े घोटालों को सामने वाली इस संस्था के सभी आरेाप सिद्ध हुए व बाद में दोषियों को सजा भी मिली, क्या इतना विश्वास में लेने के लिए काफी नहीं है।

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