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राजनीति और हालात

sach mano to

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बिहार की राजनीति हिलोरे मार रही है। कभी इस तरफ तो कभी उस तरफ। कभी दाएं, कभी बाएं। चिराग की बुझती लौ और पांच जुलाई की उम्मीद। आशीर्वाद और श्रद्वाजंलि में उलझा परिवार। आपसी सामंजस्य के बिखरते डोर। भ्रष्टाचार की पुरानी तस्वीरें। चुभता आरोप। इस्तीफा। कुछ भी नया नहीं है।

अगर अधिकारी मेरी बात नहीं सुनते तो लोगों के काम नहीं हो सकते हैं। यदि मैं लोगों की सेवा नहीं कर सकता। यदि लोगों के काम नहीं हो रहे हैं तो मुझे इस मंत्री पद आवश्यकता नहीं है। सवाल है। आखिर यहां मंत्री जी जनता की सेवा नहीं करने से मर्माहत हैं। या गाड़ी या आवास सही नहीं मिलने से असंतुष्ट। इस्तीफे की वजह क्या है। कारण…अभी तक स्पष्ट नहीं।

फिर याद आएगें नवाब शाहाबादी।

जाने क्यूं दोज़ख़ से बद-तर हो गए हालात आज
रश्क-ए-जन्नत कल तलक हिन्दोस्ताँ मेरा भी था

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