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लौट गई शिव की जटाओं में

sach mano to

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सब अवयवों से सुंदर। तीन नेत्रों वाली चतुर्भुजी। रत्नकुंभ, श्वेतकमल। वरद, अभय से सुशोभित। श्वेत वस्त्र धारणी। मुक्ता मणियों से विभूषित। सब देवों से अधिष्ठित हे मातृ गंगे। संसाररूपी विष का नाश करने वाली। वंसंतप्तों को जिलाने वाली।

हे गंगे! तू आदि मध्य और अंत सब में है। सर्वगत है। तू ही आनंददायिनी है। तू ही मूल प्रकृति है। तू ही पर पुरुष है। हे गंगे ! तू परमात्मा शिवरूप है। हे शिवे! रोगी। रोग से विपत्ति वाला विपत्तियों सेए बंधन से डरा हुआ पुरुष। छूट जाता है। सब कामों को पाता है। मरकर ब्रह्म में लय होता जाता है।

हे रेवती भागीरथी। श्वेत मगर पर बैठी तीनों नेत्रों वाली। पापों को नष्ट करने वाली भगवती, भागीरथी तुम कहां हो। तय है। धराओं से तेरी धरा। हे माते।तेरी एक बूंद जीवन को अमृत्व देने वाली है। तेरी एक बूंद से शमशान पवित्र हो उठता है। पानी का रंग। जल का स्वाद। मानवों के लायक अब शेष बचा कहां। निर्मलता। कोमलता। स्वच्छता अब बचे कहां।

हे ब्रह्मा के कमंडल से जन्मी गंगा। नहीं माता। तेरा अंश अब अगर कहीं शेष है। बचा है तो वह शिव की जटाओं में। निर्बाध स्थिर है। जहां से अब तुझे कोई भागीरथ भी उतार ना पाएगा। हमेशा से हमारी संस्कृति।आध्यात्म, हमारे धर्म में सरोकार। प्रेरणा का आधार। मानव स्वभाव में अब कहां रहा। तू लौट गई फिर शिव की जटाओं में।लौट जा। शायद वहीं उन जटाओं में ही तुम्हारे अंश अब शेष हैं।

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