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पैरेंटिंग : “आपराधिक होता बचपन “

NAV VICHAR

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उस दिन मिसेज गोयल अपने 6 वर्षीय बेटे अंकुर की क्रूरता देखकर दंग रह गयी। उनका लाडला बेटा कुत्ते के एक पिल्ले को डंडे से बुरी तरह पीट रहा था। वो पिल्ला बिल्कुल मरणासन्न हो गया था। उसका यह रूप वो पहले भी एक बार देख चुकी थी। कुछ ही दिनों पहले स्कूल में भी एक बच्चे को उसने बुरी तरह पीट दिया था। लेकिन इस बार तो मिसेज गोयल मन ही मन सशंकित थी। कहीं अंकुर का ऐसा व्यव्हार उसके मन में आपराधिक प्रबृति के बढ़ने संकेत तो नहीं था, कहीं वो बाल अपराधी बनने की ओर तो नहीं बढ़ रहा था ।

भयावह हो रही स्तिथि :

यूँ तो कहा जाता है कि बच्चे मन के सच्चे होते है . उनका निश्छल मन, कोमल भावनाये , बिना किसी दुराग्रह से ग्रसित हुए जो मन होता है वही करती है, पर वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल साइट्स का प्रभाव उनके दिलो दिमाग पर घर करने लगा है और शायद यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में अपने देश में बच्चों में अपराधिक प्रवृति में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई है जो अत्यन्त ही चिंता का विषय है। इस बात में दो मत नहीं हो सकता कि बाल- अपराधों की बढती संख्या हमारे देश के भविष्य के लिए खतरे का संकेत हैं। बच्चे हमारे देश का भविष्य है इन्हे संस्कारवान , सद्चरित्र और सुदृढ़ बनाने का दायित्व परिवार , समाज और सरकार का है , लेकिन वर्तमान सामाजिक परिवेश और अनेक सामाजिक कमजोरियों और सरकार के ढुलमुल रवैये के चलते हमारे बच्चे पतन की ओर अग्रसित हो रहे है। बाल अपराधों की ब़ढती संख्या हमारे समाज के माथे एक ऐसा कलंक है जिससे धुलने के प्रयास तुरंत शुरू किये जाने चाहिए।

क्या है सम्बंधित कानून :

भारतीय संविधान में निहित वर्तमान कानून के अनुसार, सोलह वर्ष की आयु तक के बच्चे अगर कोई ऐसा कृत्य करें जो समाज या कानून की नजर में अपराध है तो ऐसे अपराधियों को बाल अपराधी की श्रेणी में रखा जाता है। यद्यपि निर्भया कांड के बाद सोलह साल की उम्र पर अनेक वाद विवाद हुए।ऐसा माना जाता है कि बाल्यावस्था और किशोरावस्था में व्यक्तित्व के निर्माण तथा व्यवहार के निर्धारण में बच्चे को मिल रहे वातावरण का बहुत बड़ा हाथ होता है। वास्तव में बच्चों द्वारा किए गए अनुचित व्यवहार के लिये बालक स्वयं नहीं बल्कि उसकी परिस्थितियां उत्तरदायी होती हैं, इसी वजह से भारत समेत अनेक देशों में किशोर अपराधों के लिए अलग कानून और न्यायालय और न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है। इसमें ऐसे न्यायाधीशों और वकीलों की नियुक्ति की जाती है जो बाल मनोविज्ञान के जानकार होते है। बाल अपराधियों को दंड नहीं, बल्कि उनकी केस हिस्ट्री को जानने और उनके वातावरण का अध्ययन करने के बाद उन्हें जेल में नहीं वरन सुधार गृह में रखा जाता है जहां उनकी दूषित हो चुकी मानसिकता को सुधारने का प्रयत्न किए जाने के साथ उनके साथ उनके भीतर उपज रही नकारात्मक भावनाओं को भी समाप्त करने की कोशिश की जाती है। ऐसे बच्चों के साथ दण्डात्मक व्यव्हार न करके उनसे काउंसलिंग करके उनकी नकारात्मकता को दूर करने का प्रयास किया जाता है।

क्यों बढ़ रही ये प्रबृति :

यदि गौर करे तो अधिकतर मामले ऐसे है जहाँ बच्चे घरेलू तनाव के कारण अपराध करते हैं। एक और कारण गरीबी और अशिक्षा भी है। बाल अपराधियों की संख्या गावों की अपेक्षा शहरों में अधिक है। क्योंकि शहरों में माँ बाप के आपसी सम्बन्ध अच्छे न होने , एकल परिवार की विचारधारा अपनाने के कारण बच्चों के एकाकीपन की भावना से ग्रस्त होना महत्वपूर्ण कारण है। बाल अपराध मुखयतः दो प्रकार के होते है पहला समाजिक होता है तो दूसरा पारिवारिक । यद्यपि पारिवारिक अपराधों के लिए किसी दंड की व्यवस्था भारतीय कानून में नहीं हैं, लेकिन फिर भी 16 वर्ष से कम आयु वाले बच्चे अगर ऐसा कोई भी काम करते हैं जिसके दुष्प्रभावों का सामना उनके परिवार को करना पड़ता है तो वह बाल․अपराधी ही माने जाते हैं. माता․पिता की अनुमति के बिना घर से भाग जाना,अपने पारिवारिक सदस्यों के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करना, स्कूल से भाग जाना, ऐसी आदतों को अपनाना जो ना तो बच्चों के लिए हितकर है ना ही परिवार के लिए , परिवार के नियंत्रण में ना रहना।लेकिन अगर बच्चे ऐसी आदतों को अपनाएं जिससे समाज प्रभावित होता है तो निस्चय ही उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता जैसे चोरी करना, लड़ाई,झगड़ा करना, यौन अपराध करना, जुआ खेलना, शराब पीना , अपराधी गुट या समूह में शामिल होना , ऐसी जगहों पर जाना, जहां बच्चों का जाना पूर्णत वर्जित है , दुकान से कोई समान उठाना ,किसी के प्रति भद्दी और अभद्र भाषा का प्रयोग करना। बाल अपराधों की बढ़ती संख्या से सभी चिंतित है।
जहाँ तक इनके दण्ड की बात है तो देश का कानून यह मानता है कि इस उम्र के बच्चे अगर जल्दी बिगड़ते हैं और उन्हें अगर सुधारने का प्रयत्न किया जाए तो वह सुधर भी जल्दी जाते है इसीलिए उन्हें किशोर न्याय सुरक्षा और देखभाल अधिनियम 2000 के तहत सजा दी जाती है। इस अधिनियम के अंतर्गत बाल अपराधियों को कोई भी सख्त या कठोर सजा ना देकर उनके शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था करके सकारात्मक जीवन जीने के लिए प्रेरित किया जाता है उन्हें तरह तरह की व्याव्सायिक प्रशिक्षण देकर आने वाले जीवन के लिए आत्म․निर्भर बनाने की भी कोशिश की जाती है. समय के साथ साथ सन 2006 में बाल․अपराधियों को सुधारने के उद्देश्य से बनाए गए अधिनियम में कुछ संशोधन किए गए जिसके अनुसार किसी भी बाल․अपराधी का नाम, पहचान या उसके निजी जानकारी सार्वजनिक करना एक दंडनीय अपराध माना जाता है ऐसा इसलिए भी किया गया ताकि उनके अतीत से उनके भविष्य को कोई नुकसान न हो।

क्या है हमारा दायित्व :

भारतीय जीवन जीने की शैली में आये परिवर्तन , टीवी , मोबाइल और सोशल मीडिया आदि ने हमारे परिवार में संवाद का अभाव पैदा कर दिया है जिससे हम बच्चों की छोटी मोटी समस्याओं के बारे में न तो जान ही पाते है और न ही उसका हल निकालने की कोशिश करते है। वास्तव में आपसी बात चीत और पारिवारिक अपनेपन से अभिभावकों और बच्चों के बीच की दूरी और दरार को मिटाकर बच्चों के मन से आपराधिक भावना दूर की जा सकती है। ये भी जरुरी है कि हम परिवार में शान्त , सुखद और सदभावना का माहौल बनाये रखे। हमें बच्चों को भारतीय परंपरा , रीति रिवाज़ , मानवीय मूल्यों और और संवेदनाओं से जोड़े रखना होगा तभी हम उन्हें भटकने से रोक पाएंगे और उनके बचपन को सुदृढ़ता प्रदान कर पाएंगे.

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