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बदलाव की बयार, सब बदल दो यार !! (ब्यंग्य)

आईने के सामने

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सर्दी के इस चिलचिलाते मौसम में भी आजकल देश में बदलाव की लू चल रही है। शायद ही कोई इस बदलाव की चपेट में आने से बचा हो। क्या जनता, क्या नेता, क्या डाक्टर, क्या मरीज, क्या अमीर, क्या गरीब, सब बदलाव से ग्रसित हैं। बदलाव भी एक तरह का नहीं, तरह तरह का। वैसे तो ज्ञानी जन कह गए हैं कि बदलाव प्रकृति का नियम है। लेकिन आजकल तो लोगों की प्रकृति (स्वभाव) तक बदल रहा है। आइये देखते हैं कि बदलाव का संक्रमण कहाँ कहाँ तक फैल चुका है।

पहले तो केंद्र सरकार का मन बदल गया दिल्ली के बारे में। इसलिए जोड़-तोड़ कि सरकार बनाने की बजाय चुनाव घोषित कर दिया। अब इस एक बदलाव ने ही हजारों बदलावों का रास्ता बना दिया। इधर सरकार ने चुनाव घोषित किया, उधर नेताओं ने तरह तरह के बदलाव शुरू कर दिये।

सबसे पहले तो नेताओं ने पार्टियां बदलना शुरू कर दिया। आप वाले हों या कांग्रेस वाले, सब भाजपा में जाने लगे हैं। कल तक जो भाजपा सांप्रदायिक थी, उसे अब सेकुलर और राष्ट्रभक्त पार्टी बताने लगे हैं। लोगों ने अपने विचार बदल लिए हैं।

कुछ लोगों ने अपनी टोपियाँ बदल ली हैं। पहले ‘मैं अन्ना हूँ’ की टोपी पहनते थे। फिर बदलकर ‘मैं आम आदमी हूँ’ की टोपी पहनने लगे। कुछ और बदलाव का संक्रमण बढ़ा तो ‘मोदी’ की टोपी पहन ली। इसी तरह ‘गांधी’ टोपी वाले भी ‘मोदी’ टोपी में बदल रहे हैं। इस तरह से नेता टोपी बदलकर, जनता को टोपी पहना रहे हैं।

कुछ लोगों ने तो अपना दिल ही बदल लिया। कल तक राजनीति और नेताओं को गाली दे रहे थे। अब नेताओं को ही सबसे बड़ा प्रेरक बता कर देश का भाग्य बदलने का नारा देकर अपना भाग्य बदल रहे हैं। कल तक पार्टियों में पारदर्शिता लाने के लिए आरटीआई के अंदर आने की बात कहने वाले अब अपना दिल बदलकर अपनी बात से बदलने लगे हैं।

कुछ नेता तो चुनाव आते ही अपना चुनाव क्षेत्र बदलने लगते हैं। कभी जनता चुनाव में नेता को बदलती थी, अब नेता चुनाव में जनता को ही बदल देते हैं। कुछ नेता तो चुनाव में मुद्दे बदलने लगते हैं। कभी राम मंदिर मुद्दा था तो अब विकास, कालधन और धर्मांतरण हो गया है। कभी गरीबी हटाओ मुद्दा था तो अब बदलकर सेकुलरिज़्म हो गया है। कभी लोकपाल मुद्दा था तो अब बदलकर बिजली-पानी हो गया है।

कुछ लोग ‘सोच बदलो –देश बदलो’ के नारे से सत्ता में आकर, धर्म बदलो तक पहुँच गए हैं। जब पार्टियाँ कुछ नहीं बदल पातीं तो पार्टी का चेहरा ही बदल लेती हैं। कभी हर्ष वर्धन, कभी सतीश उपाध्याय कभी किरण बेदी का चेहरा। इसी तरह कभी शीला दीक्षित, कभी अरविंदर सिंह लवली, कभी अजय माकन का चेहरा बदल कर पार्टियाँ जनता का मन बदलना चाहती हैं।

बदलाव की जबर्दस्त आँधी चल रही है। कोई देश बदल रहा है, कोई मुद्दा बदल रहा है, कोई चेहरा बदल रहा है। कोई ‘दल’ बदल रहा है तो कोई ‘दिल’ बदल रहा है। कोई निष्ठा बदल रहा है तो कोई चुनाव क्षेत्र। देखना ये है कि जनता कब बदलती है?

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