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वोह रात

poet

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वोह रात अजीब थी ,
खामोश थी ,
सन्नाटे की आवाज़ थी ,
गहन अँधेरा था निशा में ,
मैं बैठा था गहन नशे में ,
अपनी किस्मत को कोसता ,
आँख थी चाँद पर ,
और हाथ में गुलाब था ,
होठों पर उसका था नाम ,
और आँख में सैलाब था ,
एक अदद ख़ामोशी थी ,
एक मैं था ,
एक तेरा दर्द था ,
और मेरी तन्हाई थी ,
आपस में करते थे बातें ,
एक दूजे से हम तीनो ,
कभी में करता था बातें तोह ,
सुनती थी तन्हाई भी ,
तेरा दर्द बढ़ बढ़ कर ,
आँख मेरी भिगो देता था ,
मैं तुझको याद कर कर ,
कभी हंस देता था ,
कभी रो लेता था ,
तेरी वोह जो चन्द बाते ,
दिल को खूब दुखती थी ,
लेकिन बाद तेरे जाने के वोही ,
तोह याद रह जाती थी ,
हम सुनते थे कभी किस्से ,
बचपन में रांझे और मजनू के ,
लेकिन आज मशुर हुए जब हम भी ,
तोह हमको भी पता चल ,
कितना दर्द उठा लाये ,
वो यहाँ तक आने में ,
कितना उन्होंने सह कर भुला होगा ,
ये पहचान बनाने में ,
धन्यवाद
मन्नू अन्खिरिया
संपर्क: +९१-९९९०४४१५०२

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