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प्रकृति की अनोखी संरचना हिमालयन मोनाल

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भारत में हर वर्ष अक्टूबर माह के पहले सप्ताह में केंद्र व राज्य सरकारों, पर्यावरणविदों, कार्यकर्ताओं, शिक्षकों आदि द्वारा लोगों में वन्यजीवों के संरक्षण के प्रति जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया जाता है| इस वर्ष वन्य जीव सप्ताह को “Sustaining all life on earth” थीम के अंतर्गत मनाया जा रहा है| सप्ताह का उद्देश्य लोगों को वन्यजीवों के संरक्षण के बारे में जागरूक बनाना व वन्यजीवों के संरक्षण के महत्व पर लोगों का ध्यान केंद्रित करना है। हिमांचल व उत्तराखण्ड के इतिहास व दादी नानियों की कई कहानियों में इस पक्षी की सुंदरता व समझदारी से जुड़ी कई कहानियाँ मिलती हैं विभिन्न प्रकार के वन्य जीवों से ही प्रकृति के संतुलन का निर्माण होता है इन के बिना हमारा जीना दूभर हो जायेगा | आज इस क्रम में माटी संस्था ने वन्य जीव सप्ताह के इस कार्यक्रम के दूसरे दिन इस प्यारी सी चिड़िया व् इसके अनोखे संसार के विषय में लोगों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है|

हिमालयन मोनाल (Lophophorus impejanus), जिसे इम्पीयन मोनाल और इम्पीयन फाउल कहा जाता है, उत्तराखंड का राज्य पक्षी है, इसे सामान्य भाषा में मोनाल भी कहा जाता है| भारत के अलावा यह अफगानिस्तान , पाकिस्तान, नेपाल, तिब्बत और भूटान में पाया जाता है, भारत में मोनाल पक्षी हिमालय के आसपास कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में पाया जाता है | मोनाल को छितरे और बिखरे जंगल पसंद है जहां पर कम पेड़ हो और विभिन्न प्रजातियों के वृक्ष पाए जाते हों| यह एक ऊंचाई पर रहने वाला पक्षी है जो समुद्र तल से 2000 मीटर से 4500 मीटर की ऊंचाई के बीच पाया जाता है|

नर हिमालयन मोनाल एक बहुत ही ज्यादा सुंदर, रंग बिरंगा पक्षी होता है, इसके शरीर पर कई रंगों के पंख पाए जाते हैं जबकि मादा हिमालयन मोनल भूरे रंग की तित्तर के समान होती है| मोनाल पक्षी का आकार 60 से 72 सेंटीमीटर के बीच होता है, एक व्यस्क हिमालयन मोनल 1.70 किलोग्राम से 2. 40 किलोग्राम तक के वजन का होता है, अक्सर जंगलों में इन्हें अकेला या फिर दो के जोड़ों में देखा जा सकता है, इसके सर पर एक विशेष प्रकार की कलगी भी पाई जाती है, नर हिमालयन मोनल मोर से भी सुंदर होता है बस इसका आकर ही मोर की तुलना में छोटा होता है| मोर की तरह नर हिमालयन मोनल भी प्रजनन काल में अपने रंग बिरंगे पंखों को दिखाकर नृत्य करता है इन का प्रजनन काल अप्रैल से अगस्त के बीच होता है|

हिमालयन मोनल एक संकटग्रस्त प्रजाति है इसे 1972 के वाइल्डलाइफ प्रोटक्शन एक्ट (WPA,1972) के तहत Schedule I श्रेणी में डाला गया है| इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) के अनुसार, मोनाल की प्रजातियों को Least concern श्रेणी के अंतर्गत रखा गया है |हिमालय की तलहटी से 13 हजार फिट की ऊंचाई पर जिस स्थान पर यह पक्षी अपना बसेरा बनाता है वहां पर जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फबारी में कमी आ रही है। इसीलिए इस पक्षी की संख्या में गिरावट आई है। भले ही 1982 के बाद से हिमालयन मोनाल (Lophophorus impejanus) प्रजाति के शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, लेकिन हिमाचल के पूर्व राज्य पक्षी के अवैध शिकार पर बहुत कम जांच हुई है।

बर्ड का शिखा पंख आसानी से उपलब्ध है और कुल्लू के लोग अभी भी त्योहारों, विवाह और बड़े त्योहारों के दौरान अपने कैप को सजाने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। हालांकि वन्यजीव विभाग का दावा है कि हाल के वर्षों में मोनाल अवैध शिकार का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन यहां के सुनार स्थानीय निवासियों से मोनाल शिखा के साथ गहने बनाने के आदेश प्राप्त करते रहते हैं। इस तरह के गहने ज्यादातर गांवों में घरों में उपलब्ध हैं। लोग सुनार को शिला देते हैं, जो इसे टोपी पर तय सोने या चांदी के साथ फिट करता है।

मोनाल को उत्तराखंड के गठन के बाद वर्ष 2000 में राज्य पक्षी का दर्जा तो मिला लेकिन आज तक इस दुर्लभ पक्षी के संरक्षण की ठोस पहल नहीं हो पाई। हालात यह है कि वर्ष 2008 में मोनाल की गणना कराई थी जिसमे राज्यभर में लगभग 919 मोनाल पाए गए थे। मोनाल की संख्या बढ़ने की बजाए लगातार घटती जा रही है जिसका कारण जलवायु परिवर्तन और अवैध शिकार को माना जा रहा है। मांसाहारी पक्षी भी इनकी संख्या घटने का एक कारण है यह मोनाल के घोंसले में रखे अंडों को नष्ट कर देते हैं। पहले इनकी संख्या हजारों में हुआ करती थी और सर्वत्र यह पक्षी दिखाई देता था। राज्य पक्षी का दर्जा देने के बावजूद इस पक्षी को बचाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

इस रंगबिरंगी चिड़िया की घटती संख्या चिंता का विषय है इसकी प्राकृतवास में मानवीय हस्तक्षेप के कारण आने वाली कमी भी इसके कम दिखाई देने के लिये उत्तरदायी है इसकी वर्त्तमान में स्थिति प्राकृतवास,पारिस्थितिक स्थिति व जनसँख्या के विषय में कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है अतः इस सन्दर्भ में माटी संस्था इस प्रजाति की वर्त्तमान स्थिति व अनुवांशिकी पर अध्ययन करने के लिए प्रयासरत है इस प्रजाति के संरक्षण हेतु हम सबको मिलकर काम करने की आवश्यकता है इस क्षेत्र में जागरूकता फ़ैलाने के उद्देश्य व् लोगो को इस प्रजाति के विषय में अवगत कराने के लिए माटी संस्था ने वन्य जीव संरक्षण सप्ताह के पहले दिन विभिन्न डिजिटल माध्यमों के द्वारा जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया ।

Ms. Shweta Nautiyal (Research Fellow)
& Dr.Ankita Rajpoot (Co-Founder & Scientist),
Maaty Organization, Dehradun
contact@maaty.org

 

डिस्क्लेमर : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावा या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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