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नन्ही चिड़िया बया के सपनों का आशियाना

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चुन चुन तिनका, मोती मनका
घर आलीशान बनाती, हो तुम
जोड़ जोड़कर स्नेह के धागे
मिल-जुल जीना सिखलाती हो तुम
ओ नन्ही चिड़िया बया
मेरे आंगन से रूठकर न जा।

आज मै मनोरम वादियों व प्रकृति प्रेमियों की नगरी देहारादून से लिख रही हूँ। बचपन से ही एक चिड़िया से प्रभावित रही हूँ वो है बया। कुछ साल पहले तक देहारादून के आस पास के क्षेत्रों में बया के घोसले आसानी से दिखायी दे जाते थे, परन्तु अब ये ढूढने से भी नहीं मिलते हैं। मानव समुदाय के प्रकृति में बढ़ते हस्तक्षेप जैसे पेड़ो की कटाई, चारों तरफ घरों का बनना आदि के कारण अब यह नन्ही चिड़िया बया और उसके घोसले दोनों गायब हो गए होते जा रहे हैं। परन्तु फिर भी इस वर्ष मैंने देहारादून के आस पास कई क्षेत्रों में इस चिड़िया व इसके घोसलों के आसपास इसे अपने परिवार के साथ चहचहाते सुना तो मैं खुद को लिखने से रोक नहीं पायी।

बया का वैज्ञानिक नाम (Ploceus philippinus) और अंग्रेज़ी में इसे Baya Weaver या Tailor Bird कहा जाता है। यह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया में पाया जाता है। यह बारिश का पूर्वानुमान लगाते हुये ठीक बरसात से पहले ही अपना घोसला बनाना शुरू करते है। बया एक गौरया के आकार की चिड़िया होती है, हल्के भूरे से रंग की, नर व मादा चिड़िया देखने में एक समान होती हैं, लेकिन प्रजनन काल में नर बया का रंग चमकता हुआ पीला हो जाता है और उसके सिर पर एक क्राउन जैसे संरचना बन जाती है।

इसका घोसला बनाने का जो स्वभाव है वह एहसास है एक बहुत प्यारे से रिश्ते का, परिवार का, अपने बच्चों के पालने का, जिम्मेदारियों के सामने डट कर खड़ा रहने का और सभी लोगों के लिए एक बड़ा सबक सीखने का। इस चिड़िया का नर ही घोसला बनाता है इसका घोसला बहुत सुंदर व वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना होता है जो इस छोटे से पक्षी के सुघड़, व व्यस्थित स्वभाव को आसानी से दर्शाता है।जब यह घोसला आधा ही बना होता है तब ही नर बया घोसले के किनारे पर लटककर बहुत तेजी से अपने पंखों को फड़फड़ाता हुआ शोर मचाता है। नर बया आवाज़ के द्वारा विशेषतः मादाओं को आकर्षित करता है।

वैज्ञानिक इसे मेटिंग कॉल कहते हैं पर अगर हम हमारी भाषा हिन्दी की बात करें तो इस आवाज़ को हमारे कवि महोदय प्यार के नगमे कहते हैं। भावनाओं से सराबोर होते हुये हम यह कह सकते हैं कि यह एक बहुत ही प्यारा पल होता है उसके लिए भी और उसके इस व्यवहार पर शोध कर रहे हम जैसे लोगों के लिए भी। इनकी मादा काफी सूझ बूझ व समझदारी के साथ अपने जीवनसाथी को चुनने का निर्णय लेती हैं। इस पक्षी का व्यवहार अपने आप में हम मनुष्यों को एक बड़ी सीख देने वाला होता है।

बया अधबुने घोसलें में बैठकर उसका पूर्ण रूप से परीक्षण करती है। उसकी सुंदरता, सुदृढ़ता व बनाने के तरीके को देखते हुए सुनिश्चित करती है कि यह घोसला उसके परिवार को सुरक्षा प्रदान कर सकता है कि नहीं। हर प्रकार से ठोक बजा कर ही वह नर बया का प्रणय निमंत्रण स्वीकार करती है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये अपने परिवार की जरूरत व जनसंख्या के हिसाब से ही अपने घोसले का आकार सुनिश्चित करती है, इसका घोसला एक मंजिल से लेकर 3 मंजिल तक देखा गया है।

जितना सुंदर घोसला बया बनाता है उतना सुंदर घोसला कोई भी पक्षी नहीं बनाता। बया एक सामाजिक पक्षी है यह झुंड में रहते हैं अतः एक ही पेड़ पर कई सारे बया के घोसलें आसानी से देखने को मिल जाते हैं। एक पेड़ पर 60 तक बया के घोसले देखने को मिल जाते हैं जबकि जानकारों के हिसाब से बया की एक कालोनी में 200 से अधिक तक घोसले पाये जा सकते हैं। कई बया पक्षी के जोड़े मिलकर एक ही पेड़ पर घोसला बनाते है जिसको बनाने में इन्हे लगभग 28 दिन का समय लगता है। घोसला बनने के बाद नर व मादा दोनों मिलकर मिट्टी के गीले टुकड़े लगाकर घोसलों को और मजबूत बनाते है। मादा बया ऊचे पेड़ों पर बने घोसलों को ही ज़्यादातर पसंद करती है।

यह पक्षी एक बार में दो से चार अंडे देती है । जिनमे 14 से 17 दिनों के बाद बच्चे निकल आते है। नर व मादा दोनों मिलकर बच्चों कि देखभाल करते हैं और मात्र 17 दिनों के पश्चात ही नन्ही बया आकाश की ऊचाइयों को छूने के लिए घोसला छोड़ देते है। प्रायः सभी पक्षी अपना घोसला पेड़ की दो मजबूत डालियों के बीच बनाते है।परंतु बया एक बहुत ही तीव्र बुद्धि का पक्षी है वह अपना घोसला इस प्रकार से बनाता है ताकि वह हवा में झूलता रहे ताकि घोसला में दूसरे पक्षियों व जंतुओं के घुसने का खतरा कम रहता है।

बया अपना घोसला बनाते समय सुंदरता के साथ- साथ मजबूती का भी ध्यान रखती है। यह अपने घोसलों में सूखे हुए तिनकों का प्रयोग नहीं करती अपितु मजबूत खरपतवार, पत्तियाँ, बाजरे के पत्तों को अपनी चोंच से चीरकर धागे जैसी संरचना बनाती है जिसे एक विशेष प्रकार से बुनकर अपने लालटेन की तरह लटकते हुए घोसले का निर्माण करती है। बया नदी, तालाब, या झील के आस पास ही कांटेदार पेड़ों पर अपना घोसला बनाती है ताकि इसे घोसला बनाने के लिए खरपतवार के साथ- साथ भोजन भी आसानी से प्राप्त हो सके।

बया अपने घोसलें में रोशनी करने के लिए जुगनूओं का प्रयोग करती है। बया तालाब के किनारे से मिट्टी लाकर उसे घोसले के अंदर चिपका देती है और फिर तुरंत कही से तुरंत जुगनू को पकड़कर लाती है तथा गीली मिट्टी के सूखने से पहले ही वह जुगनू को उससे चिपका देती है। जुगनू वहाँ चिपक कर टिमटिमाता रहता है और इस तरह बया का घर रोशन होता है।अब तो आप इस नन्ही चिड़िया की अक्ल का लोहा मान गए ना।

वनों की अंधाधुंध कटाई व प्रकृति में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के साथ- साथ रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग भी इन पक्षियों की संख्या में लगातार गिरावट के लिए उत्तरदायी है। वह अपने भोजन के लिए खेतों से अनाज चुगते है और अधिक रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग, जो कही ना कही इनके साथ –साथ हम इन्सानों के लिए हानिकारक हैं। ऐसे खेतों में चुगने से कई बार इन नन्हें पक्षियों की मौत तक हो जाती है। गौरैया, गिद्ध आदि पक्षियों की प्रजातियों के साथ बया भी आज विलुप्त होने की कगार पर है।

आज के इस दौर में जब हम प्रकृति से विमुख हो रहे थे तब प्रकृति ने हमें कोरोना वायरस के रूप में एक ऐसा पाठ पढ़ाया है जिसके प्रभाव से हम अब तक उबर नहीं पाये है। आज इस दौर में हमे प्रकृति संरक्षण व इन नन्हें पक्षियों जो कि हम जीवन जीने की कला सिखाते हैं, को संरक्षित करने के लिए अपने अपने स्तर पर प्रयास करना चाहिए।

अगर आज हम अपनी आने वाली पीढ़ीयों के जीव जंतुओं के इस अनूठे संसार से परिचित नहीं करवायेँगे तो कल इनका प्रकृति से संपर्क व भावनात्मक रिश्ता नहीं कायम हो पाएगा। और जब तक हम सब इन पेड़ पौधों जीव जन्तुओं से भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ेगे हम इनके संरक्षण के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे। आज भी जब अपने बचपन में अपने नाना नानी के द्वारा सुनाये गए गाने “ चुन- चुन करती आई चिड़िया, दाल का दाना लायी चिड़िया” को सुनते है तो एक पल के लिए अपना बचपन फिर से जी लेते है। आज भी कही किसी पेड़ पर बया का घोसला देखते ही प्रकृति प्रेमी बरबस ही उसकी ओर आकर्षित होकर इस चिड़िया के बारे में सोचने पर विवश हो जाते है। आइये इस अनुपम संसार के बचाने के लिए मिलकर कदम बढ़ाये।

Dr. Ankita Rajpoot,
Co-Founder & Scientist,
Maaty Organization, Dehradun

 

डिस्क्लेमर : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावा या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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