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केटीके थंगमणि

loksangharsha
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के.टी.के. थंगमणि संक्षेप में ‘के.टी.के.’ के नाम से जाने जाते थे। वे मद्रास प्रेसिडेंसी और बाद में तमिलनाडु में पार्टी और मजदूर आंदोलनों के महारथी थे। उनका जन्म 19 मई 1914 को मद्रास प्रेसिडेंसी के मदुरई जिले केथिरूमंगलम में हुआ। उनके पिता का नाम कुलैया नाडर और माता का कलिअम्मल था। पिता बहुत धनवान थे। वे रैली इंडिया लिमिटेड नामक एक ब्रिटिश कंपनी की ओर से जावा, इंडोनेशिया से आयात की जाने वाली चीनी के एकमात्र वितरक थे। इसके अलावा उनकी दो कपड़ा मिलें थीं, एक थिरूमंगलम में और दूसरी थेनी जिले में।

शिक्षा
‘के.टी.के’ ने अपनी स्कूली शिक्षा के.एस.आर. विद्यालय, तिरूमंगलम में पूरी की। इसके बाद उन्होंने 1935में गणित में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर केबी.ए. ऑनर्स किया। उसी वर्ष वे उच्चतर शिक्षा के लिए इंग्‍लैंड चले गए। लंदन यूनिवर्सिटी से उन्होंने मिडल टेम्पल लॉ कॉलेज से अप्रैल 1940में बार-एट-लॉ की डिग्री प्राप्त हो गई।

इंग्लैंड में मार्क्सवाद का प्रभाव
लंदन में पढ़ाई के दौरान ‘‘के.टी.के’ का संपर्क कई सारे उन भारतीय विद्यार्थियों से हुआ जो आगे चलकर महत्वपूर्ण कम्युनिस्ट और आजादी के बाद भारत के नेता बने। इनमें शामिल थे एन.के. कृष्णन, पार्वती कृष्णन, इंद्रजीत गुप्त, ज्योति बसु, निखिल चक्रवर्ती, मोहन कुमार मंगलम, इंदिरा गांधी, फिरोज गांधी, डा. एके. सेन। उस वक्त एन.के. कृष्णन ‘इंडियन मजलिस’ के संगठन मंत्री थे। यह भारतीय विद्यार्थियों का संगठन था। के.टी.के इसमें सक्रिय हो गए। जल्द ही वे मार्क्सवाद की ओर आकर्षित होने लगे। थंगमणि उस मीटिंग में उपस्थित थे जिसमें माइकेल ओ’ डायर की हत्या हुई। यह घटना 13 मार्च 1940 की है जब ऊधम सिंह ने लंदन के कैक्सटन हॉल में ओ’डायर पर गोलियां चलाईं जिसे के.टी.के ने अपनी आंखों से देखा। माइकेल ओ’डायर उस वक्त पंजाब के गवर्नर थे जब अप्रैल 1919में जनरल डायर की देखरेख में जालियांवाला गोलीकांड किया गया जिसमें सैकड़ों लोग गोलियों से भून दिए गए थे। इससे पहले के.टी.के की मुलाकात नेता सुभाष चन्द्र बोस से डबलिन, आयरलैंड में हुई। बोस 1935-38 के दौरान योरप के दौरे पर थे। उन्हें लंदन नहीं जाने दिया गया था।

भारत वापसी
बार-एट-लॉ मिलने के बाद थंगमणि भारत लौट आए और जून 1940 में मद्रास हाईकोर्ट में वकील बन गए। ‘के.टी.के’ बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे। वे हॉकी के बहुत ही अच्छे खिलाड़ी थे। वे मद्रास प्रेसिडेंसी में ‘आत्म-सम्मान आंदोलन में भी सक्रिय रहे। इस बीच सी.पी. अधिथानर ने, जो सिंगापुर में कानून की प्रैक्टिस कर रहे थे, के.टी.के को सिंगापुर बुलाया। वहां के.टी.के ने प्रैक्टिस शुरू कर दी और वहां डेढ़ साल से भी अधिक रहे। उनकी शादी ए. रामास्वामी नाडार की पुत्री बहिअम्मल के साथ 31 अक्टूबर1941 को हुई। नाडार सिंगापुर में एक धनी उद्यमी और उद्योगपति थे। इस बीच के.टी.के मलाया की कम्युनिस्ट पार्टी के सम्पर्क में आए। उनके कम्युनिस्ट विचार अधिक गहरे हुए।

1942 में सिंगापुर पर जापानी सेना ने बमबारी शुरू कर दी। फलस्वरूप थंगमणि, उनकी पत्नी और आधिथानर को सिंगापुर छोड़ मद्रास वापस आना पड़ा। सिंगापुर निवास के दौरान के.टी.के की मुलाकात वियतनाम के भावी नेता हो ची मिन्ह के साथ हुई। आगे जब सफल क्रांति के बाद हो ची मिन्ह वियतनाम के प्रमुख के रूप में भारत आए तो उनकी मुलाकात फिर के.टी.के से हुई। इस बीच 1942 का आंदोलन समूचे भारत में फैल गया। मद्रास प्रेसीडेंसी में भी आंदोलन फैल गया। तिरूनववेली, रामनाथ पुरम, मदुरई तथा अन्य स्थानों पर कांग्रेस के तथा अन्य स्वयंसेवकों ने आंदोलन किए और गिरफ्तारियां दीं। कुलशेखर नपट्टिनम, तिरूनलवेली में कांग्रेस के स्वयंसेवकों एवं पुलिस के बीच झड़पें हुई। अंग्रेज पुलिस अफसर डब्ल्यू लोन ने गोलियां चलाई जिससे झडपें तेज हो गईं और लोन मारा गया। इसकी हत्या का दोष का शी राजन और राजगोपालन पर डाला गया। के.टी.के ने उनका मुकदमा अपने हाथों में लिया। यह एक ऐतिहासिक मुकदमा बन गया। दोनों अभियुक्तों को जिला कोर्ट और हाई कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई। प्रसिद्ध कम्युनिस्ट एडवोकेट ए. रामचंद्र ने भी यह केस लड़ा। प्रीवी काउंसिल के सामने दूसरी अपील की गई। उस जमाने में सुप्रीमकोर्ट नहीं हुआ करता था। सुप्रसिद्ध ब्रिटिश कम्युनिस्ट वकील डी.एन. प्रिट से के.टी.के थंगमणि ने सम्पर्क किया और प्रिट ने केस लड़ा। केस काफी कठिनाइयों के बीच लड़ा गया। मद्रास प्रेसिडेंसी में कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ने मिलजुलकर उन दोनों की रिहाई के सवाल पर संघर्ष किया।आखिर कार फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया।यह बहुत बड़ी सफलता थी जो लंबी और कठिन लड़ाई के बाद हासिल की जा सकी। के.टी.के ने 1942 से 1946तक प्रैक्टिस थी।


ट्रेड यूनियन आंदोलन में
के.टी.के थंगमणि 1943 में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। वे पहले ही ट्रेड यूनियन आंदोलन में सक्रिय हो चुके थे। उनकी मुलाकात कांग्रेस के सुप्रसिसिद्ध नेता, तमिल विद्वान और टी यू नेता थिरू वी.का. तथा अन्य से हुई। उन्होंने सिंगारवेलु की देखरेख में मजदूरों में सक्रिय कार्य किया।के.टी.के ने मदुरई में बस ट्रांसपोर्ट वर्कर्स यूनियन की स्थापना की। वे टी.वी.एस. बस ट्रांसपोर्ट यूनियन और एस.आर.वी.एस. बस ट्रांसपोर्ट वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष रहे। यूनियन के कामों के दौरान वे कई बार गिरफ्तार हुए। साथ ही उन्होंने सफाई कर्मचारियों की भी यूनियन बनाई। इसके अलावा उन्होंने कपड़ा और हैंडलूम मजदूरों के बीच भी काम किया। ये मजदूर आजाद हिन्द फौज और रॉयल इंडियन नेवी के नौ सैनिकों के समर्थन में भी उतरे। 1945 में मदुरई में मद्रास प्रादेशिक ट्रेड यूनियन कांग्रेस, एटक से सम्बद्ध का सम्मेलन हुआ। इसकी स्वागत समिति के अध्यक्ष के.टी.के थंगमणि थे। 1946 में उन्होंने एस.आर.वी.एस. की हड़ताल का नेतृत्व किया। अंग्रेज सुपरिटेंड्ट ऑफ पुलिस ने के.टी.के से हड़ताल न करवाने की अपील की। के.टी.के ने जवाब में कहा कि वे खुद इंगलैंड में अपनी आंखों से ब्रिटिश मजदूर वर्ग के लड़ाकू संघर्ष देख चुके हैं। पीछे हटने का सवाल ही नहीं था। उन्हें गिरफ्तार कर तीन महीनेकी जेल की सजा दी गई।1948 में वे फिर एस आर वी हड़ताल में गिरफ्तार कर लिए गए। इस बार उन्हें 4 साल की सजा मिली और 1952 में ही छूट पाए। उन्होंने पोर्ट एंड डॉक ;बंदरगाह मजदूरों के बीच भी काम किया। उन्हें मजदूर वर्ग के सर्वोच्च नेता एस.ए. डांगे तथा ए.एस.के. अ ̧यंगर, कल्याणसुंदरम एवं अन्य के साथ काम करने का मौका मिला।

एफ.एस.यू. का गठन
1943 में मद्रास प्रेसिडेंसी में ‘फ्रेंड्स ऑफ सोवियत यूनियन’, एस.एस.यू. अर्थात सोवियत संघ के मित्र नामक संगठन की स्थापना की गई। आजादी के बाद यही संगठन ‘इस्कस’बन गया। सुप्रसिद्ध कांग्रेस नेता एवं तमिल विद्वान थिरू वी. कल्याण सुंदरम इसके प्रथम अध्यक्ष एवं के.बालदंडा युधम सचिव चुने गए। मदुरई में 1943 में इसका प्रथम अधिवेशन आयेजित किया गया। इसकी स्वागत समिति के अध्यक्ष के.टी.के थंगमणि बनाए गए। इसमें कम्युनिस्टों एवं कांग्रेसियों ने संयुक्त रूप से हिस्सा लिया। एक कला एवं फोटो प्रदर्शनी भी आयोजित की गई जिसका उद्घाटन मदुरई जिला एवं सेशन्स जज एस.ए.पी. अ ̧यर ने किया। सम्मेलन में 10 हजार से भी अधिक लोग शामिल हुए।

मदुरई षडयंत्र केस
दिसंबर 1946 में के.टी.केथंगमणि को 135 अन्य कम्युनिस्टों के साथ सुप्रसिद्ध ‘मदुरई षडयंत्र केस’ में गिरफ्तार कर लिया गया। अन्य गिरफ्तार नेताओं में पी. माणिकम, पी.राममूर्ति, शांतिलाल, सुबै ̧या, एस.कृष्णमूर्ति, इत्यादि थे।लेकिन वे सभी भारत की आजादी से एक दिन पहले 14 अगस्त 1947 को बिना मुकदमे के रिहा कर दिए गए। मदुरई की एक आम सभा में उनका भारी स्वागत किया गया।

‘बी.टी.आर.’ काल
फरवरी-मार्च 1948 में सम्पन्न भाकपा की दूसरी पार्टी कांग्रेस, कलकत्ता के लिए के.टी.के प्रतिनिधि चुने गए लेकिन वे इसमें शामिल नहीं हो पाए। वे 30 जनवरी 1948 को ही टीवीएस और एस आर वी एस ट्रांसपोर्ट कम्पनियों में हड़ताल के सिलसिले में गिरफ्तार कर लिए गए। 1948 में इस पार्टी कांग्रेस से कुछ पहले से ही वाम-संकीर्णतावादी दुस्साहसिक ‘बीटीआर’ लाइन हावी हो गई। मद्रास प्रदेश की पार्टी को इससे भारी नुकसान उठाना पड़ा। के.टी.के तथा 134 अन्य पार्टी नेता गिरफ्तार कर वेल्लोर जेल में बंद कर दिए गए। इनमें ए एस के अ ̧यंगर,गोपालन तथा अन्य शामिल थें11 फरवरी 1950 को सेलम डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल जेल में पुलिस द्वारा गोलीकांड में 22 कम्युनिस्ट मारे गए। उस वक्त ‘बीटीआर’ लाइन के तहत जेल में ‘वर्ग-संघर्ष’ चलाने की नीति से भी कई अनावश्यक घटनाएं घटीं जिनसे पार्टी को जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा। पुलिस और अधिकारियों का रूख दमनकारी था सो अलग। के.टी.के तथा अन्य साथियों ने वेल्लोर जेल में 26 दिनों तक भूख हड़ताल थी। पुलिस ने अमानवीय लाठीचार्ज किया जिसमें के.टी.के बाएं हाथ और पैर में फ्रैक्चर हो गया।उन्हें 1952 के प्रथम सप्ताह में रिहा कर दिया गया। पार्टी ने उन्हें ट्रेडयूनियन आंदोलन की देखभाल करने का जिम्मा दिया और वे मद्रास में एटककार्यालय से काम करने लगे।


चुनावों में हिस्सेदारी
थंगमणि पार्टी द्वारा 1952 के आम चुनावों में मदुरई लोकसभा सीट से खड़े किए गए। वे मात्र कुछ सौ वोटों से ही हार गए। उन्हें फिर 1957 के चुनावों में उसी सीट से खड़ा किया गया। इस बार वे लोकसभा के लिए चुन लिए गए। संसद में उन्हांने प्रभावशाली और सक्रिय वक्ता के रूप में अपना स्थान बनाया। उन्होंने संसद में मजदूरों और किसानों की समस्याएं विशेष तौर पर उठाई। वे प्रथम सांसद थे जिन्होंने ‘प्रश्नकाल’ का विशेष सदुपयोग किया। उन्होंने जनता के एक हजार से भी अधिक प्रश्न उठाए। उन्होंने पब्लिक सेक्टर और राष्ट्रीयकरण के मसलों पर खास ध्यान दिलाया। ट्रांसपोर्ट मजदूरों के नेता होने के नाते उन्होंने मोटर ट्रांसपोर्ट वर्कर्स एक्ट, 1961 को पास कराने में विशेष भूमिका निभाई। उन्होंने 1957 में बीजिंग ;उस वक्त पीकिंग में सम्पन्न डब्ल्यू एफ टी यू के सम्मेलन में भाग लिया।

1961 में उन्होंने अजय घोष, भूपेश गुप्ता तथा अन्य के साथ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और माओ त्से तुंग के साथ बातचीत करने भाकपा प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में चीन की यात्रा की। जब थंगमणि दिल्ली में थे तो प्रधानमंत्री नेहरू ने उनसे योजना कमिशन की समितियों में काम करने का अनुरोध किया। इस प्रकार वे एक साल काम करते रहे। 1971 में के.टी.के तमिलनाडु विधानसभा में मदुरई से चुने गए। 1971 से 76 के बीच उन्होंने विधानसभा में जनता की आवाज जोरदार तरीके से उठाई। तमिलनाडु एटक के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या महासचिव की हैसियत से 50 वर्षों से भी अधिक काम करते रहे। वे कई वर्षों तक एटक के उपाध्यक्ष रहे। उनकी 80वें जन्मदिन के अवसर पर तमिलनाडु की पार्टी और एटक ने विशेष ‘सुवेनर’ ;विशेष अंक प्रकाशित किया। हीरेन मुखर्जी ने उनका जीवन गांधीवादी आदर्शों पर चला बताया। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अपने अंतिम वर्ष उन्होंने राज्य पार्टी हेडक्वार्टर ‘बालन इल्लम’ में बिताए। के.टी.के. थंगमणि की मृत्यु वर्ष की उम्र में 26 दिसंबर 2001 को हो गई।

-अनिल राजिमवाले

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