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कैसे पहुंचेंगे कोरोना वायरस की थाह तक

समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया

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कोरोना वायरस ने लोगों के दिलों में दहशत पैदा कर दी है। इस महामारी से डराने में झूठी खबरों और अफवाहों ने बड़ा रोल निभाया है। 15वीं सदी के आसपास प्लेग ने अपना कहर बरपाया तो इसके बाद हैजे से लोग डरते रहे। कभी मोतिझिरा का प्रकोप रहा तो कभी मलेरिया का दानव लोगों को परेशान करता रहा। ये सारे के सारे रोग कहीं न कहीं वायरस जनित ही माने जाते थे। इस तरह की बीमारियों ने बहुत ज्यादा तादाद में लोगों को अपना शिकार बनाया और लोगों की जान भी बहुतायत में गई। कुछ सालों तक इन बीमारियों पर शोध हुए और उसके बाद इसके टीके या एंटीबॉयोटिक दवाओं ने बैक्टीरिया जनित उन रोगों के खतरों को काफी हद तक कम भी किया। जलवायू परिवर्तन, ग्रीन हाऊस गैसेज आदि के उत्सर्जन के चलते वायरस की नई नई पौध भी सामने आ रही है। वर्तमान में कोरोना वायरस का खतरा चहुंओर मण्डराता दिख रहा है। यह खतरा बड़ा माना जा सकता है पर इसके पहले जब विज्ञान ने बहुत तरक्की नहीं की थी उस दौर के खतरों से वर्तमान समय का खतरा कम ही माना जा सकता है।

 

 

कीट पतंगों, मच्छरों, पशु, पक्षियों आदि से फैलने वाले रोगों की तादाद बीसवीं सदी के पहले तक बहुत ज्यादा रही है। उस दौर में विज्ञान ने भी बहुत ज्यादा तरक्की नहीं की थी, इसलिए बीमारी को समझ पाने में ही सालों लग जाया करते थे, ईलाज की बात तो बहुत दूर की कोड़ी हुआ करती थी। पंद्रहवीं सदी में चूहों के जरिए फैले प्लेग की चपेट में अनगिनत लोग आए थे। इसके बाद हैजे ने कहर बरपाया। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में स्पेनिश फ्लू की दस्तक से लगभग दस करोड़ लोग असमय ही काल कलवित हुए थे।

 

 

वायरस के मामले में वैज्ञानिकों की राय अलग अलग ही मानी जा सकती है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि वायरस मूलतः जीव जगत की सबसे सुगम और सरल संरचना है, पर इसकी वजह से ही सारी समस्याओं का जन्म होता है। कुछ का मानना है कि यह जीव जगत की बहुत पुरानी संरचना है। अगर आप दीपावली के पहले घर की सफाई कर रहे हैं तो उड़ती धूल के कणों में छिपे बैठे कुछ वायरस सक्रिय होकर आप पर प्रहार करते हैं और आप सर्दी खांसी या बुखार की जद में भी आ सकते हैं।

 

 

वैज्ञानिकों के द्वारा जीव विज्ञान में जीव जगत को वनस्पिति और जीव जंतुओं में विभाजित किया गया है। वायरस पर शोध के लिए यह जरूरी है कि वायरस को किस श्रेणी में रखा जाए! इसे जीव माना जाए या जंतु की श्रेणी में रखा जाए। वायरस को अमूमन जीव और जंतुओं के बीच की कड़ी ही माना जाता है। यह भी माना जाता है कि वायरस दशकों क्या सदियों तक निर्जीव अवस्था में ठीक उसी तरह रहते हैं जिस तरह मेंढक साल के अनेक माह सुसुप्तावस्था में पड़ा रहता है। जैसे ही ये किसी के शरीर के अंदर प्रवेश करते हैं वैसे ही ये पूरी तरह सक्रिय हो उठते हैं।

 

 

इस तरह के वायरस पर शोध करने के लिए यह जरूरी है कि इसका इतिहास जाना जाए, पर विडम्बना यह है कि वायरस के किसी तरह के फासिल्स नहीं होते हैं। अगर इसके फासिल्स होते तो निश्चित तौर पर इस पर शोध में मदद मिल पाती। फासिल्स शब्द आपने बहुत बार सुना होगा, पर यह है क्या बला! इस बारे में हम आपको बताते हैं। दरअसल, किसी समय जीवित अवस्था में रहने वाले जीवों के परिरक्षित अवशेषों अथवा उनके द्वारा किसी पत्थर, चट्टान पर छोड़ी गई उन छापों को जिन्हें बाद में सुरिक्षत निकाला जाता है को जीवाश्म या फासिल्स कहा जाता है।

 

 

जीवाश्म को अंग्रेजी में फासिल्स नाम दिया गया है। इस शब्द की उत्पत्ति लेटिन शब्द फासिल से हुई है, जिसका अर्थ होता है, खोदकर प्राप्त की जाने वाली वस्तु। जीवाश्म का संधि विग्रह अगर किया जाए तो यह जीव और अश्व अर्थात पत्थर से मिलकर बना हुआ है। जीवाश्म में कार्बनिक विकास का प्रत्यक्ष प्रमाण भी मिलाता आया है। जीवाश्व के अध्ययन को जीवाश्म विज्ञान या पैलेंटोलॉजी का नाम दिया गया है।

 

 

अलग अलग तरह के अब तक मिले जीवाश्मों पर हुए शोध से यही बात निकलकर सामने आई है कि इस धरती पर अलग अलग समय या कालों में तरह तरह के जीव जंतु अस्तित्व में थे। अनेक शोधों पर अगर नजर डाली जाए तो पुरातन काल से वर्तमान युग तक मिले जीवाश्म और जीवित अवस्था में पाए जाने वाले जीवों में काफी समानता भी मिली है। अभी इस संबंध में शोध जारी है, पर अनेक तरह के जीवों के जीवाश्म पूरी तरह नहीं मिल पाए हैं। हॉ, यह बात जरूर है कि मनुष्य, ऊॅट, हाथी, घोड़ा आदि के जीवाश्मों की लगभग पूरी श्रृंखला के बारे में पता लगाया जा चुका है।

 

 

जीव जंतुओं के जीवाश्म अगर बनते हैं तो उसके लिए जीव का कंकाल अथावा उसके किसी कठोर अंग, हड्डी आदि का होना बहुत ही जरूरी है। जिन जीवों में कठोर के बजाए सिर्फ कोमल अंग ही होते हैं, उनके जीवाश्म नहीं बनने के कारण उन जीवों के संबंध में अध्ययन किया जाना संभव नहीं हो पाया है। वैज्ञानिकों की मानें तो मानव शरीर के डीएनए का दस फीसदी हिस्सा वायरस से ही निर्मित हुआ है। वायरस विशेषज्ञ लुईस पी विल्लारियल ने तो यहां तक कह दिया था कि वायरस के कारण ही मनुष्य का शरीर बन पाया है।

 

 

धरती पर वायरस की इतनी किस्में और तादाद मौजूद हैं, कि वैज्ञानिकों के द्वारा तो इस बात पर भी शोध किया जा रहा था कि वायरस का दवा के रूप में कैसे उपायोग किया जाए! यह बात उस समय निकलकर सामने आई जब अनेक लोगों पर एंटीबायोटिक दवाएं भी बेअसर होने लगीं थीं। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के कम होते ही वायरस का अटेक होता है और उसके बाद ही समस्या आरंभ होती है। कहा जाता है कि एंटीबायोटिक दवाओं का असर कुछ सालों के बाद कम होने लगता है और इसका कारण यह भी सामने आया है कि वायरस या जीवाणु के द्वारा इस तरह की दवाओं के लिए अपने अंदर प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली जाती है। यही कारण है कि एंटीबायोटिक्स के क्षेत्र में दवाओं की खोज सतत ही चलती रहती है। अनेक तरह के विषाणु तो इस तरह के भी हैं, जिन पर एंटीबायोटिक दवाएं भी बेअसर ही हैं।

 

 

बहरहाल, कोरोना वायरस के लिए टीका या दवा ईजाद करने के लिए वैज्ञानिक फिकरमंद दिख रहे हैं, जो राहत की बात मानी जा सकती है, पर इतिहास गवाह है कि जब भी कोई नया वायरस अस्तित्व में आता है तो उसके लिए दवा बनाने में कम से कम डेढ़ साल तो लग ही जाता है। टीका या दवा ईजाद होने तक वायरस कहां और कितना नुकसान पहुंचा सकता है, इस बारे में विश्व के सारे देशों को सर जोड़कर बैठने और इसका प्रसार ज्यादा न हो पाए इस बारे में ठोस रणनीति बनाए जाने की जरूरत महसूस हो रही है।

 

 

 

नोट : यह लेखक के निजी विचार हैं, इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं। 

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